RBI और मोदी सरकार की खीच तान

RBI और मोदी सरकार की खीच तान

भारत के केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार के बीच की कड़वाहट अब सतह पर आ गई है. दोनों के बीच टकराव की स्थिति ऐसे समय में पैदा हुई है जब भारत की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है.

रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर के बयान के बाद टकराव सार्वजनिक होने से केंद्र सरकार परेशान और नाराज है. केंद्र को आशंका है कि इस वाकये से इनवेस्टर्स की नजर में देश की छवि खराब हो सकती है.

शुक्रवार को अपने एक 'विस्फोटक बयान' में डिप्टी गवर्नर आचार्य ने आरबीआई की स्वायतत्ता को कमजोर करने की सरकारी कोशिशों पर सवाल उठाए थे. कहा कि इससे बाजार और देश के आर्थिक हालात पर विपरीत असर पड़ सकता है. उनका यह बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. आरबीआई में नंबर दो माने जाने वाले आचार्य ने यह बयान मुंबई में शीर्ष उद्योगपतियों के इवेंट में दिया और कहा कि उन्हें गवर्नर उर्जित पटेल (Urjit Patel) ने इस बात को उठाने के लिए सुझाव दिया था.  उधर सोमवार को ऑल इंडिया रिजर्व बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन ने कहा-देश के केंद्रीय बैंक को कमजोर करने की कोशिशों का विरोध किया जाएगा.

केंद्रीय बैंक के डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले दिनों साफ शब्दों में सरकार को चेता दिया कि अगर उसने संस्थान की स्वायत्तता को ठेस पहुंचाई, तो बाजार को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

  • केंद्रीय बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के कार्यकाल की शुरुआत केंद्र सरकार के साथ बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में शुरू हुई थी। आरबीआई ने केंद्र के नोटबंदी के फैसले का समर्थन भी किया था। लेकिन बाद में मुख्य ब्याज दर के मुद्दे पर दोनों के संबंधों में तब कड़वाहट आनी शुरू हो गई, जब पटेल के नेतृत्व वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने दरों पर फैसला लेने से पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन से मुलाकात करने से मना कर दिया।
  • केंद्र सरकार आरबीआई द्वारा महज 30 हजार करोड़ रुपये के लाभांश के भुगतान से हैरान रह गई, जबकि बजट 66 हजार करोड़ रुपये का था। इसके कारण केंद्रीय वित्त मंत्री को केंद्रीय बैंक से और भुगतान की मांग करनी पड़ी, लेकिन उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
  • आरबीआई ने तमाम लोन रिस्ट्रक्चरिंग स्कीम्स को बंद कर दिया और बैंकों से सभी संभावित नुकसान के लिए फंड (प्रोविजनिंग) अलग करने को कहा, चाहे डिफॉल्ट एक दिन का ही क्यों न हो। सरकार तथा बैंकों ने आरबीआई के इस कदम का यह कहकर विरोध किया कि यह कदम व्यवहार्य नहीं है।
  • नीरव मोदी द्वारा किए गए पीएनबी घोटाले को पकड़ने में नाकाम रहने के लिए सरकार ने आरबीआई की कड़ी आलोचना की। इसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए गवर्नर ने आरोप लगाया कि सरकारी बैंकों के रेग्युलेशन के लिए सरकार उसे शक्तियां नहीं दे रही। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने यह कहते हुए पलटवार किया कि आरबीआई के पास इसके लिए पर्याप्त शक्तियां थीं और सरकारी बैंकों के सीईओ की नियुक्ति पर उससे परामर्श लिया गया था।
  • आरबीआई ने आधे सरकारी बैंकों को प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के दायरे में रखा है, जिसके कारण उनपर कर्ज देने को लेकर कई तरह की पाबंदियां लगी हुई हैं। पीसीए के तहत अगर बैंकों को कर्ज देना है, तो सरकार को पहले उन्हें रिकैपिटलाइज करना पड़ेगा। सरकार व्यवस्था में नकदी की किल्लत के मद्देनजर, आरबीआई पर इन पाबंदियों को हटाने का दबाव बना रही है। आरबीआई ने साफ शब्दों में कहा है कि पीसीए के कारण ही बैंकों का बैड लोन (फंसा कर्ज) बढ़ने से बचा है।
  • पेंमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में संशोधन करने के लिए गठित अंतर-मंत्रालयी समिति ने एक पेमेंट रेग्युटर के गठन का सुझाव दिया है, जो पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम पर केंद्रीय बैंक की शक्तियों को बाइपास करेगा। इसपर नाराजगी जताते हुए आरबीआई ने कहा था कि पेमेंट सिस्टम बैंक डोमिनेटेड है और केंद्रीय बैंक द्वारा इसका रेग्युलेशन डॉमिनैंट इंटरनेशनल मॉडल है।
  • नचिकेत मोर को उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही बिना सूचना दिए बोर्ड से हटा दिया गया। आरबीआई के सीओओ के लिए दिग्गज बैंकर नचिकेत मोर पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की पहली पसंद थे।नचिकेत मोर सरकार द्वारा मांगे गए अधिक लाभांश का खुलकर विरोध कर रहे थे। सरकार पर बोर्ड में अपने पसंदीदा लोगों को भरने का आरोप लगाया गया है, इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े एस. गुरुमूर्ति और सतीश मराठे भी शामिल हैं।
  • तेल कंपनियों की फॉरेक्स जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई द्वारा विशेष डॉलर विंडो खोलने के लिए मना करने पर केंद्र सरकार को कंपनियों को विदेश से कर्ज लेने की मंजूरी देने को मजबूर होना पड़ा।
  • आईएलएंडएफएस डिफॉल्ट की वजह से गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) सेक्टर में नकदी का भारी संकट पैदा हो गया। इसका असर बाजार पर पड़ने का खतरा पैदा हो गया, क्योंकि म्यूचुअल फंडों द्वारा करीब 40 फीसदी डेट इन्वेस्टमेंट एनबीएफसी कंपनियों में किया गया है। साल 2008 में पैदा हुए कुछ इसी तरह के संकट के दौरान आरबीआयह भी पढ़ेंः उर्जित पटेल भी बने केंद्र के गले की फांस! जानिए पूरा माजराई ने एक स्पेशल पर्पज वीइकल के सहारे एनबीएफसी की संपत्तियों को खरीदने की मंजूरी प्रदान की थी। सरकार फिर यही सुविधा दोबारा चाह रही थी, जिसका आरबीआई ने विरोध किया। परिणामस्वरूप, एनबीएफसी की संपत्तियां खरीदने के लिए सरकार को सरकारी बैंकों का रुख करना पड़ा। 
  • सरकार की नजर आरबीआई के पास मौजूद अतिरिक्त रिजर्व पर है। सरकार तर्क दे रही है कि अधिकांश दूसरे केंद्रीय बैंक इतनी नकदी पर नहीं बैठे हैं। दरअसल, आरबीआई इस अतिरिक्त नकदी को सरकार को देने को इच्छुक नहीं है, क्योंकि वह इसे विनिमय दर को नियंत्रित करने का जरिया मानती है और उसका मानना है कि इसका इस्तेमाल केंद्र सरकार के राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए नहीं होना चाहिए।


कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी आरबीआई और सरकार के बीच विवाद की खबरों पर बयान दिया है. उन्होंने सोमवार को कहा कि यह देखना सुखद है कि आखिरकार आरबीआई  गवर्नर उर्जित पटेल (Urjit Patel) केंद्रीय बैंक को पीएम नरेंद्र मोदी से ‘बचा रहे हैं.'उन्होंने कहा कि देश भाजपा-आरएसएस को संस्थाओं पर कब्जा नहीं करने देगा.पटेल और ‘टीम मोदी' के बीच टकराव की खबरों के बाद गांधी ने कहा कि गवर्नर के आरबीआई के बचाव में आने में कोई विशेष देरी नहीं हुई है.गांधी ने ट्वीट किया, “यह अच्छा है कि आखिरकार पटेल आरबीआई को ‘मिस्टर 56' से बचा रहे हैं। कभी नहीं से विलंब बेहतर। भारत भाजपा/आरएसएस को हमारी संस्थाओं पर कब्जा नहीं करने देगा.

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