राजस्थान में महिला उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत पुरुषों की तुलना से ज्यादा

राजस्थान में महिला उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत पुरुषों की तुलना से ज्यादा

महिला आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक गलियारों में गाहे बगाहे उठता रहता है। लेकिन महिलाओं को विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने अभी तक उस संख्या में प्रत्याशी नहीं बनाया जितने की वकालत उनके नेता करते हैं। राजस्थान में अगर जीत के प्रतिशत के आंकड़ों पर गौर करें तो जीतने वालों में महिला प्रत्याशी पुरुष प्रत्याशियों से कहीं आगे हैं।

इतना ही नहीं राजस्थान में महिला मतदातों ने पिछले विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड कायम किया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में ज्यादा मतदान किया था। मताधिकार के इस्तेमाल के मामले में आधी आबादी पुरुषों से आगे रही।

साल 1998 से साल 2013 तक के चार विधानसभा चुनावों ने नतीजों के देखें तो तीन बार महिला उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में ज्यादा रहा है। सिर्फ साल 2003 के चुनाव में पुरुष उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत महिला उम्मीदवारों से ज्यादा रहा। वहीं साल 1998 में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की जीत का प्रतिशत सबसे ज्यादा था।

लेकिन जमीनी स्तर पर नेताओं की बातें और उनपर अमल करने के बीच का विरोधाभास ही है कि चुनावी मैदान में महिला प्रत्याशी पुरुषों के तुलना में बहुत कम है।  पिछले 4 चुनावों में पुरुष प्रत्याशियों के मुकाबले 10 फीसदी महिला प्रत्याशी भी मैदान में नहीं उतारी गईं।

राजस्थान देश का पहला राज्य था जहां महिलाओं को पंचायत और नगरपालिका चुनाव में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। यह आरक्षण 2008 में भाजपा के कार्यकाल में दिया गया था।

वहीं 2003 में राजस्थान में एक बार ऐसी स्थिति बनी कि राज्य के तीन सबसे बड़े पदों पर महिलाएं आसीन थीं। उस समय राज्यपाल प्रतिभा पाटील थीं, मुख्यमंत्री पद पर वसुंधरा राजे और विधानसभा अध्यक्ष पद पर सुमित्रा सिंह थीं।

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