'भारत रत्न' लोक नायक' जय प्रकाश नारायण

भारत सरकार ने मरणोपरांत उन्हें 1998 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया


जय प्रकाश नारायण एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे, आजादी की लड़ाई से लेकर भारत की राजनीति तक उन्होंने हर स्तर पर अपनी छाप छोड़ी, इसी के चलते भारत सरकार ने मरणोपरांत उन्हें 1998 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया, इससे पहले वर्ष 1965 में उन्हें समाज सेवा के लिए 'मैग्सेसे' पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

जयप्रकाश का जन्‍म 11 अक्‍टूबर 1902 को बलिया और बक्सर जिले के बॉर्डर पर स्थित सिताबदियारा गांव में हुआ, इनके पिता का नाम श्री देवकी बाबू और माता का नाम फूलरानी देवी था, इनकी पत्नी प्रभावती को महात्मा गांधी बहुत मानते थे, इसलिए प्रभावती शादी के बाद भी कस्तूरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम में ही रहीं।

जयप्रकाश ने साल 1922 तक बिहार विद्यापीठ से पढ़ाई की और उसके बाद वे अमेरिका चले गये, अमेरिका से वापस आने वाद नारायण भारत में चल रहे सविनय अवज्ञा आन्दोलन से जुड़ गए, सितंबर 1932 में नारायण को आन्‍दोलन में हिस्‍सा लेने के आरोप में ब्रिटिश सरकार ने मद्रास से गिरफ्तार कर लिया और नासिक जेल भेज दिया।

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने सरकार का किराया और राजस्व रोकने का अभियान चलाया, इसी के साथ ही उन्होंने टाटा स्टील कंपनी में हड़ताल करा दी और ये कोशिश की कि अंग्रेजों को इस्पात न पहुंचाया जा सके, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करके 9 महीने के लिए जेल भेज दिया गया।

उस दौरान महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच रिश्ते सही नहीं थे, जब वो जेल से छूटे तो उन्होंने उन दोनों के बीच सुलह कराने का भी प्रयास किया, इसके चलते उन्हें बंदी बना लिया गया और मुंबई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैंप जेल में भेज दिया गया, साल 1942 में वो भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे आर्थर जेल से फरार हो गए।

आजादी के बाद साल 1974 में किसानों के बिहार आंदोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की, इसी के साथ ही उन्होंने तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार की प्रशासनिक नीतियों का विरोध किया था, उस दौरान उनका स्वास्थ्य गिरने के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया, उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट पार्टी ने गुजरात राज्य में चुनाव जीता।

1975 में निचली अदालत में इंदिरा गांधी पर चुनावों में भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो गया और जयप्रकाश ने उनके इस्तीफ़े की मांग की, इसके बदले में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी और नारायण तथा अन्य विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण यानी जेपी पूरे विपक्ष की अगुआई कर रहे थे, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन यानी 25 जून को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की रैली थी, जेपी ने इंदिरा गांधी को स्वार्थी और महात्मा गांधी के आदर्शों से भटका हुआ बताते हुए उनसे इस्तीफे की मांग की, उस रैली में जेपी द्वारा कहा गया रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता का अंश अपने आप में नारा बन गया है, यह नारा था- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जेपी ने कहा कि अब समय आ गया है कि देश की सेना और पुलिस अपनी ड्यूटी निभाते हुए सरकार से असहयोग करे, उन्होंने कोर्ट के इस फैसले का हवाला देते हुए जवानों से आह्वान किया कि वे सरकार के उन आदेशों की अवहेलना करें जो उनकी आत्मा को कबूल न हों।

कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी की स्थिति नाजुक हो गई थी, सुप्रीम कोर्ट ने भले ही उन्हें पद पर बने रहने की इजाजत दे दी थी, लेकिन समूचा विपक्ष सड़कों पर उतर चुका था, इंदिरा गांधी किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहती थीं और उन्हें अपनी पार्टी में किसी पर भरोसा नहीं था, ऐसे हालात में उन्होंने आपातकाल लागू करने का फैसला ​किया, इसके लिए उन्होंने जयप्रकाश नारायण के बयान का बहाना लिया।

26 जून, 1975 की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, ‘आपातकाल जरूरी हो गया था, एक व्यक्ति सेना को विद्रोह के लिए भड़का रहा है, इसलिए देश की एकता और अखंडता के लिए यह फैसला जरूरी हो गया था’।

भारत के इतिहास और राजनीति के लगभग सभी विद्वान एकमत हैं कि इंदिरा गांधी के खिलाफ आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने देश का राजनीतिक इतिहास निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाई, कुछ तो यहां तक मानते हैं कि यदि यह फैसला इंदिरा गांधी के खिलाफ न जाता तो देश में शायद ही आपातकाल लगाने की नौबत आती।

1977 में इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंका, इसके बाद जनता पार्टी की सरकार बनाई, इदिरा गांधी के खिलाफ सबसे मजबूत नेता यही थे लेकिन उन्होंने सरकार बनने के बाद कोई पद लेने से इनकार कर दिया, 8 अक्टूबर साल 1979 को पटना, बिहार में जयप्रकाश नारायण का देहान्त हो गया।
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