राजपूतों का राजस्थान पर वर्चस्व क्यों

राजपूत राजस्थान चुनाव में काफी अहम हैं

क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है, आजादी से पहले यह क्षेत्र राजपूताना (राजपूतों का स्थान) कहलाता था, सातवीं शताब्दी में यहां चौहान राजपूतों का प्रभुत्व बढ़ने लगा और बारहवीं शताब्दी तक उन्होंने एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था, चौहानों के बाद इस योद्धा जाति का नेतृत्व मेवाड़ के गहलोतों ने संभाला।
धीरे-धीरे उनका पतन शुरू हुआ, पहले मुहम्मद गजनी फिर गोरी ने उन्हें हराया, इसके बाद राजपूत अल्लाउद्दीन खिलजी, बाबर, अकबर, मराठों तथा अंग्रेजों से लगातार शिख्शत खाते ही रहे, हालांकि इस सिलसिले में मराठों और अंग्रेजों को छोड़ा जा सकता है क्योंकि तब तक राजपूतों की ताकत पूरी तरह खत्म गई थी, दिल्ली के शुरुआती सुल्तानों ने अगर उन्हें भारत के पश्चिम में स्थित रेतीले इलाके तक समेट दिया था तो मुगलों ने उन्हें जागीरदार बनाकर छोड़ा, राजपूत राजाओं में पृथ्वीराज चौहान, राणा सांगा और महाराणा प्रताप का जिक्र सबसे ज्यादा होता है, लेकिन अहम लड़ाइयों में इन तीनों राजाओं को न सिर्फ पराजय मिली थी बल्कि उन्होंने मैदान भी छोड़ दिया था।
राजपूतों का सामना ऐसे मुसलमानों से था जिनकी मजबूती धर्म के प्रति उनकी कट्टरता थी, अपने सैनिकों में जोश भरने के लिए मुसलमान शासक धर्म का इस्तेमाल जरूर करते थे, लेकिन उनकी जीत में अकेले इस बात का योगदान नहीं था, अपने धर्म के प्रति समर्पण राजपूतों में भी कम नहीं था और उनके साहस की तो उनके दुश्मन भी तारीफ करते थे, बाबर ने खुद लिखा है कि खानवा की लड़ाई से पहले उसके सैनिक राणा सांगा की सेना से घबराए हुए थे जिसकी वीरता के बारे में कहा जाता था कि वह अंतिम सांस तक लड़ती रहती है
तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान के पास गोरी से करीब तीन गुनी बड़ी सेना थी तो खानवा की लड़ाई में राणा सांगा के पास बाबर की तुलना में चार गुना ज्यादा लड़ाके थे, लेकिन सांगा की तुलना में बाबर की फौज कहीं ज्यादा अनुभवी थी, राजपूतों के साथ यही समस्या थी, सेना विशाल थी लेकिन ऐसा कम ही होता था कि सब एक की सुनते हों, राजपूत सदियों तक पराजित होते रहे, लेकिन उनकी रणनीति में कोई बदलाव नहीं आया।

इसके बाद आजादी के समय भी सरदार पटेल ने राजपूत राजाओं को एकीकृत कर अलग -अलग बटें स्टेट को एक कर राजस्थान का निर्माण किया, 1952 में पहले आम चुनाव के बाद से ही राजस्थान की लोकतांत्रिक राजनीति का ताना-बाना राजपूतों के इर्द-गिर्द बुना जाता रहा है।
प्रदेश की राजनीति में राजपूतों के निर्णायक होने का जो सिलसिला जोधपुर के पूर्व महाराज हनवंत सिंह के साथ शुरु हुआ था वह पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत से लेकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और हाल ही में भाजपा से बाग़ी होकर कांग्रेस में शामिल हुए मानवेंद्र सिंह तक बरकरार है।
राजपूत संगठनों ने फिल्म पद्मावत और आनंदपाल के एनकाउंटर की जांच को लेकर जिस तरह उत्पात मचाया, उसने इस समुदाय की उसी सामंतवादी छवि को पुष्ट करने का काम किया जिसे साहित्य और सिनेमा ‘ठाकुर शैतान सिंह या दुर्जन सिंह’ जैसे किरदारों के रूप में गढ़ता रहा है।
राजस्थान के ग्रामीण अंचल में शादी के कई वर्षों के बाद या फिर कई बेटियों के बाद पैदा हुए बेटे को बुरी नजर से बचाने के लिए उसका नकारात्मक भाव वाला नाम शैतान सिंह या दुर्जन सिंह’ रखने की मान्यता रही है, बचपन में बुरी नज़र से बचाने के लिए रखे गए ये नाम ही राजपूतों की बुरी छवि गढ़ने का आधार बन गए।
राजस्थान विधानसभा में 200 में से सर्वाधिक 26 विधायक राजपूत जाति से ही आते हैं, प्रदेश से लोकसभा जाने वाले कुल 25 सांसदों में से भी चार इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस राजपूत प्रत्याशियों को तुलनात्मक तौर पर ज्यादा मौके देती हैं, राजस्थान में दोनों दल मिलाकर 400 में से करीब 40 टिकट राजपूतों के नाम करते हैं, राज्य में सिर्फ तीन- शेरगढ़ (जोधपुर), कोलायत (बीकानेर) और विद्याधरनगर (जयपुर) विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां राजपूत प्रत्याशी आमने-सामने ताल ठोकते हैं, यानी राजस्थान में राजपूत विधायकों के जीतने की तय संख्या सिर्फ तीन है जो इस कौम के प्रतिद्वंदी माने जाने वाले जाट समुदाय की औसतन संख्या अठारह से काफी कम है।
सदियों तक शासन करने की वजह से राजपूतों के प्रति लोगों के जेहन में निष्ठा, भय, धर्म, संस्कृति और सम्मान का मिला जुला भाव प्रकट होता है, यह इनके पक्ष में सकारात्मक माहौल तैयार करता है।
राजस्थान में राजपूतों के अलावा गुर्जर, मीणा, जाट और कुछ इलाकों में यादव समुदाय ‘दबंग’ माने जाते हैं, आबादी के लिहाज से राजस्थान में इनमें से गुर्जर, मीणा, जाट की संख्या राजपूतों से डेढ़ से दोगुनी या उससे भी ज्यादा बताई जाती है, जमीन से जुड़े राजनीतिकारों के मुताबिक जिन इलाकों में दबंग समुदायों की बहुलता होती है वहां के दूसरे निवासियों के मन में एक आशंका का भाव हमेशा महसूस किया जा सकता है, लेकिन राजपूतों के मामले में ऐसा नहीं है।
मध्यकाल के पहले से ही समाज की कई जातियां जैसे- ब्राह्मण, वैश्य, राजपुरोहित, चारण, प्रजापत और सैन, राजपूतों से जो जुड़ाव महसूस करती थीं वह कहीं न कहीं आज भी मौजूद है, इसलिए जब नेतृत्व के चयन की बारी आती है तो ये सभी राजपूत को आगे करना पसंद करते हैं।
सिर्फ इन्हीं कुछ जातियों में नहीं बल्कि राजस्थान में दलित, जनजाति और अल्पसंख्यकों के बीच भी राजपूतों को लेकर अपेक्षाकृत अधिक भरोसा महसूस किया जा सकता है।
राजस्थान की जनजातियों के बीच भी राजपूतों के प्रति एक सकारात्मक भाव महसूस किया जा सकता है, इतिहासकार महाराणा प्रताप के दौर से ही भील और गाड़िया-लोहार समुदायों के बीच राजपूतों के प्रति सद्भाव का ज़िक्र करते हैं, यदि राजस्थान में करीब 11 फीसदी आबादी वाले मुस्लिम समुदाय की बात करें तो यहां भी राजपूतों के प्रति अपेक्षाकृत ज्यादा सहजता देखी जा सकती है, 1527 में राणा सांगा के साथ मिलकर बाबर के खिलाफ जंग लड़ने वाले हसन खां मेवाती, 1576 में राणा प्रताप के सिपहसालार हाकिम खां सूरी और कुछ घरानों द्वारा मुग़लों के साथ रोटी-बेटी के संबंध जैसी ऐतिहासिक घटनाओं की वजह से भी अल्पसंख्यक राजपूतों से कहीं न कहीं नजदीकी महसूस करते हैं।
राजपूतों की अपनी सामाजिक व्यवस्था भी उनकी स्वीकार्यता को प्रदेश भर में व्यापक बनाती है, रजवाड़ों के दौर में किसी एक रियासत या उसके आस-पास की रियासतों में एक ही गोत्र के राजपूतों के निवास करने की वजह से उनके आपसी विवाह-संबंधों को वर्जित माना जाता था, यदि चौहान वंश की बात करें तो अजमेर से निकले इस गोत्र के राजपूत सवाई माधोपुर, जालौर, सिरोही, कोटा, बूंदी और झालावाड़ तक फैले हैं, नतीजतन चौहान राजपूत परिवार द्वारा अपने बेटे या बेटी की शादी के लिए इन जिलों को छोड़ने की पूरी संभावना रहती है, ऐसे में साधारण से साधारण राजपूत परिवार का दायरा भी कई जिलों में फैला रहता है।
राजपूत राजस्थान चुनाव में काफी अहम हैं, जिस पार्टी को उनका समर्थन मिलता है, उसकी जीत की संभावना बढ़ जाती है, कई दिग्गज राजपूत नेता रहे हैं, जिन्होंने नाराज़गी के कारण चुनाव से पहले दूसरी पार्टी का दामन थामा है, इन्होंने जिस पार्टी का दामन थामा, पार्टी ने उसका लाभ उठाने में ज़रा भी देर नहीं की।
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