आरबीआई और सरकार के बीच बढ़ी तनातनी

आरबीआई और सरकार के बीच बढ़ी तनातनी
भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच तनातनी काफी बढ़ गई है। आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के पहले दिए गए बयान का ट्विटर पर मजाक उड़ाया।

केन्द्रीय रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के बीच स्वायत्तता को लेकर जारी जंग के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने कहा है कि वह भारत में जारी विवाद पर नजर बनाए हुए है. आईएमएफ ने कहा कि उसने दुनियाभर में ऐसी सभी कोशिशों का विरोध किया है जहां केन्द्रीय बैंकों की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश की गई है.

कम्युनिकेशन डायरेक्टर गेरी राइस ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केन्द्रीय बैंकों के काम में किसी तरह का दखल न देना सबसे आदर्श स्थिति है. राइस के मुताबिक दुनिया के अधिकांश देशों में इसी स्थिति में केन्द्रीय बैंक काम कर रहे हैं.

भारत में जारी जंग पर राइस ने कहा कि केन्द्र सरकार को इस विवाद से पीछे हटने की जरूरत है क्योंकि आईएमएफ का मानना है कि केन्द्रीय बैंक और सरकार के बीच जिम्मेदारी और जवाबदेही को स्पष्ट रखने की जरूरत है. यह स्थिति दुनिया के सभी देशों के लिए मान्य है कि केन्द्रीय बैंक या वित्तीय नियंत्रकों को अपना काम करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए. राइस ने कहा कि दुनिया के किसी देश को केन्द्रीय बैंक के कामकाज में दखल नही देना चाहिए.

केन्द्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने बीते हफ्ते कहा था कि केन्द्रीय बैंक के कामकाज में दखल देना देश के लिए खतरनाक स्थिति पैदा कर सकता है. विरल आचार्य के इस बयान के बाद केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई पर आरोप लगाया कि 2008 से 2014 तक केन्द्रीय बैंक ने कर्ज बांटने के काम की अनदेखी की और देश के सामने गंभीर एनपीए समस्या खड़ी हो गई.

इन आरोप प्रत्यारोप के बीच यह भी तथ्य सामने आया कि बीचे कुछ दिनों में केन्द्र सरकार ने आरबीआई एक्ट में प्रस्तावित सेक्शन 7 का सहारा लेते हुए केन्द्रीय बैंक से संवाद किया. सेक्शन 7 केन्द्र सरकार को आरबीआई की तुलना में अधिक शक्ति देता है. हालांकि आजादी के बाद से कितनी भी गंभीर आर्थिक स्थिति रही हो इस सेक्शन का इस्तेमाल कभी नहीं किया गया है.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) गवर्नर की ताकत घटा कर बैंक में अपना ज्यादा से ज्यादा दखल बढ़ाने के प्रयासों में लगी सरकार का मकसद है बैंक की जमा पूंजी से राजकोषीय घाटा कम करना। बैंक के पास मौजूदा समय में करीब 3.5 खरब रुपये का कोष है। यह कोष दो-चार साल में नहीं, बल्कि तीन दशक के बाद इस स्तर तक पहुंचा है। ऑल इंडिया रिजर्व बैंक इंप्लॉय एसोसिएशन (एआईआरबीईए) का कहना है कि सरकार अपना घाटा पूरा करने के लिए इस कोष को अपने कब्जे में लेना चाहती है। यही वजह है कि सरकार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से आरबीआई गनर्वर की शक्तियां कम करने का हर संभव प्रयास कर रही है।

बैंक अधिकारियों का कहना है कि सरकार की मंशा अब दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। गवर्नर की पावर कम करने के साथ-साथ वित्त मंत्रालय अब आरबीआई की मोनेटरी पॉलिसी कमेटी पर नियंत्रण करना चाहती है। इस कमेटी में छह सदस्य होते हैं, जिनमें तीन बैंक के प्रतिनिधि और तीन सरकार द्वारा नामित सदस्य होते हैं। कमेटी में गवर्नर को वीटो करने की पावर हासिल है। बैंक जिस दर पर लोन देते हैं, वह सब यही कमेटी तय करती है। पिछली कई बैठकों में देखने को मिला है कि सरकार के प्रतिनिधि बैंक लोन की दरें कम कराने के लिए अड़ जाते हैं।

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