इसरो ने अब तक का सबसे भारी उपग्रह जीसैट-11 अंतरिक्ष में भेजा

इसरो ने अब तक का सबसे भारी उपग्रह जीसैट-11 अंतरिक्ष में भेजा
भारत में इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) ने अब तक के सबसे भारी उपग्रह जीसैट-11 को अंतरिक्ष में भेज दिया गया है. दक्षिणी अमेरिका के फ्रेंच गुयाना स्पेस सेंटर से फ्रांस के एरियन-5 रॉकेट की मदद से इसे लॉन्च किया गया. अगर यह 5,845 किग्रा वजनी उपग्रह सही सलामत पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो जाता है तो यह देश के टेलिकॉम सेक्टर खासकर ग्रामीण भारत के लिए बहुत बड़ा वरदान साबित होगा.

जीसैट-11 एक हाई थ्रोपुट कम्युनिकेशन सैटेलाइट है. इसका मतलब हुआ कि यह कई सारे क्षेत्रों में किरणों (बीम) के जरिए तरंगे पहुंचाएगा. यह तरंगे केवल भारतीय उपमहाद्वीप को ही नहीं बल्कि आसपास के द्वीपों को भी कवर करेंगीं. इसका मतलब यह है कि यह बीम के जरिए कम्युनिकेशन करेगा. जिसमें बहुत ज्यादा फ्रीक्वेंसी पर चलने वाले विशेष तरीके के ट्रांसपॉन्डर की तर्ज पर यह काम करेगा. इससे न सिर्फ इंटरनेट की कनेक्टिविटी ज्यादा हिस्सों में होगी बल्कि उसकी स्पीड भी बढ़ेगी. एक स्पॉट बीम एक सैटेलाइट सिग्नल होता है जो कि तेजी से किसी क्षेत्र विशेष में ज्यादा फ्रीक्वेंसी की तरंगे भेज सकता है और एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में सीमित होता है. ये बीम जितनी पतली होंगी तरंगे उतनी ही ज्यादा शक्तिशाली होंगीं. इसी बीम की प्रक्रिया को सैटेलाइट कई बार दोहराएगी ताकि पूरे देश को कवर किया जा सके. इससे उलट इनसैट जैसी पारंपरिक सैटेलाइट ब्रॉड सिंगल बीम का प्रयोग करती हैं. जो कि इतनी शक्तिशाली नहीं होतीं कि पूरे देश को कवर कर सकें.

जीसैट-11 को पहले मार्च-अप्रैल में लांच किया जाना था. जबकि जीसैट-6A उपग्रह मिशन के अप्रैल में फेल हो जाने के चलते ISRO ने इसे फ्रेंच गुयाना से छोड़ने का फैसला किया. एजेंसी के अनुसार इलेक्ट्रिकल सर्किट में आई एक खराबी के चलते जीसैट-6A से सिग्नल नहीं मिल सका था. यह 29 मार्च को लॉन्च किया गया था. उन्हें डर था कि कहीं जीसैट-11 का हाल भी ऐसा ही न हो. कई सारे टेस्ट के बाद ही इसे लॉन्च किया गया.

GSAT-11,  ISRO का बनाया अब तक का सबसे भारी उपग्रह था. इसरो कई बार विदेशी सैटेलाइट्स को लॉन्च कर चुका है. हम इस पर गर्व भी करते रहे हैं कि इसरो विदेशी सैटेलाइट्स को लॉन्च कर पैसे कमा रहा है और आत्मनिर्भर बन रहा है. लेकिन कई बार ISRO खुद अपने सैटेलाइट्स के लॉन्च के लिए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के जरिए फ्रेंच गुयाना के कोऊरू से भेजा है.  दक्षिण अमेरिका स्थित फ्रेंच गुयाना के पास लंबी समुद्री रेखा है, जो इसे रॉकेट लॉन्चिंग के लिए और भी मुफीद जगह बनाती है. इसके अलावा फ्रेंच गुयाना एक भूमध्यरेखा के पास स्थित देश है, जिससे रॉकेट को आसानी से पृथ्वी की कक्षा में ले जाने में और मदद मिलती है. जियोस्टेशनरी कक्षा की ऊंचाई भूमध्य रेखा से करीब 36,000 किलोमीटर होती है.

पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है. ज्यादातर रॉकेट पूर्व की ओर से छोड़े जाते हैं ताकि उन्हें पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के लिए पृथ्वी की गति से भी थोड़ी मदद मिल सके. वैश्विक स्तर की सुविधाओं से युक्त होने, राकेट के लिए ईंधन आदि की पर्याप्तता आदि ऐसी वजहें हैं जिनके चलते भी ISRO अपने बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स के लॉन्च के लिए फ्रेंच गुयाना को एक मुफीद लॉन्च साइट मानता रहा है. फ्रेंच गुयाना, फ्रांस की कॉलोनी है. फ्रांस ने इस पर कब्जे का पहला प्रयास 1963 में किया था, जो असफल रहा था. बाद में फ्रांस ने इसे बंदियों के लिए कालापानी के तौर पर प्रयोग करना शुरू कर दिया. 19वीं शताब्दी के मध्य तक फ्रांस ने यहां करीब 56,000 लोगों को भेजा, जिनमें से मात्र 10 फीसदी ही अपनी सजा पूरी करके लौट सके थे.

भारत के PSLV, GSLV- Mk2 और GSLV- Mk3 रॉकेट 4 टन का पेलोड ले जाने में सक्षम हैं. ऐसे तो PSLV ही सैकड़ों सैटेलाइट ले जाने में सक्षम है लेकिन ये नैनो, माइक्रो सैटेलाइट होते हैं. हालांकि भारत को 4 टन से ज्यादा वजनी रॉकेट भेजने की जरूरत बहुत कम ही पड़ती है.

जीसैट-11 के बाद अगली सैटेलाइट जीसैट-20 होगी जिसे अगले साल पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जाएगा. ISRO के चेयरमैन के सिवान ने बताया, इसरो का लक्ष्य 2019 तक चार सैटेलाइट लांच के जरिए 100 गीगाबाइट/ सेकेंड तक की स्पीड पाने का है. ये सैटैलाइट होंगीं- जीसैट-19, जीसैट- 29, जीसैट- 11 और जीसैट- 20. इन चार सैटेलाइट्स में से दो जीसैट- 19 और जीसैट- 29 पहले ही छोड़े जा चुके हैं.

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