कौन है गार्गी पुरस्कार की गार्गी एक परिचय

 गार्गी गोत्र में जन्म लेने के कारण इन्हें गार्गी कहा जाता था
प्राचीन काल से ही हमारे देश में ऐसी महान नारियाँ जन्म लेती रही हैं जिन्होंने ज्ञान-विज्ञान, त्याग-तपस्या, साहस और बलिदान के अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।
वैदिक काल की महिलाएं अपनी बुद्धि और सर्वोच्च आध्यात्मिक गुणों के लिए प्रसिद्ध थीं, गार्गी उस समय की असाधारण महिलाओं में से एक थीं और वह एक प्रसिद्ध विद्वती के साथ-साथ एक प्रवर्तिका भी थीं, अपने ब्रह्म ज्ञान के ज्ञान से परिचय करवाने वाली ब्रम्ह ज्ञानी “गार्गी” के ज्ञान से प्रेरित होकर राजस्थान सरकार ने गार्गी पुरस्कार रखा, और गार्गी पुरस्कार की पहचान हुई
जिले की होनहार छात्राओ को गार्गी पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है, आप में से कई बड़े व बुजर्ग गार्गी शब्द से परिचित तो होंगे मगर आज के दिन हम इस गार्गी शब्द से पुन: परिचय करवाते है
गार्गी ऋषि वचक्नु की पुत्री थीं और बचपन से ही उनकी शिक्षाविदों के प्रति विशेष रुचि थी,  गार्गी गोत्र में जन्म लेने के कारण इन्हें गार्गी कहा जाता था, गार्गी ने सभी के अस्तित्व की उत्पत्ति पर सवाल उठाते हुए कई भजनों की रचना की थी, जब विदेह के राजा जनक ने एक ‘ब्रह्मयज्ञ’- एक दार्शनिक बैठक का आयोजन किया था, तो उस यज्ञ में गार्गी की भागीदारी करने का अनुमान लगाया गया था।
एक बार राजा जनक ने यज्ञ किया, उसमें देशभर के प्रकाण्ड विद्वान उपस्थित हुए, जनक के मन मे यह इच्छा जाग्रत हुई कि जो विद्वान यहाँ आए हैं, पता लगाया जाय इनमें सर्वश्रेष्ठ विद्वान कौन है ?
इसके लिए उन्होंने अपनी गौशाला की एक हजार गायों के सींगों में दस-दस तोला सोना बँधवा दिया और घोषणा की कि जो सर्वश्रेष्ठ विद्वान हो वह इन सब गायों को ले जाए, जब कोई भी गायें लेने आगे नहीं बढ़ा तो याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से कहा, ’’उठो और गायों को ले चलो।’’
इस पर विद्वानों को क्रोध आ गया, उन्होंने बिगड़कर याज्ञवल्क्य से पूछा, ’’क्या तुम इतनी बड़ी सभा में स्वयं को सबसे बड़ा विद्वान समझते हो?’’ याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया, ’’यह बात नहीं है, यहाँ उपस्थित सभी विद्वानों को मैं प्रणाम करता हूँ, मैं गायें इसलिए ले जा रहा हूँ, क्योंकि मुझे इनकी आवश्यकता है।’’
सभी विद्वान चिल्ला उठे, ’’हमसे शास्त्रार्थ करो,’’ याज्ञवल्क्य इस बात पर सहमत हो गए और विनम्रतापूर्वक सभी विद्वानों के प्रश्नों का उत्तर देने लगे, धीरे-धीरे सभी विद्वान प्रश्न पूछ कर चुप हो गये, अन्त में गार्गी ने कहा, ’’राजन! आज्ञा हो तो मैं भी प्रश्न करूँ।’’ राजा जनक ने आज्ञा दे दी।
गार्गी ने याज्ञवल्क्य से प्रश्न पूछना प्रारम्भ कर दिया, गार्गी के प्रश्न गहन अध्ययन पर आधारित थे, प्रश्नों को सुनकर विद्वतमण्डली मन ही मन गार्गी के ज्ञान की सराहना करने लगी।
अपने सवालों के जवाब से वह इतनी प्रभावित हुई कि जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया और वहां मौजूद बाकी प्रतिद्वंद्वी ब्राह्मणों से कहा, ‘सुनो, अगर भला चाहते हो तो याज्ञवल्क्य को नमस्कार करके अपने छुटकारे का रास्ता ढूंढो, इस सभा में याज्ञवल्क्य से बड़ा कोई विद्वान नहीं है, इन्हें कोई नहीं हरा सकता।
यह कहकर गार्गी चुप हो गई, मानो उसने भी याज्ञवल्क्य को अपना गुरु मान लिया हो, इतने तीखे सवाल पूछने के बाद गार्गी ने जिस तरह याज्ञवल्क्य की प्रशंसा कर अपनी बात खत्म की तो उसने वाचक्नवी होने का एक और गुण भी दिखा दिया कि उसमें अहंकार का नामोंनिशान नहीं था।
ज्ञानी को अहंकार नहीं आता, बल्कि ज्ञानवृध्द को गुरु मान लेने में ही अपने बड़प्पन को व्यक्त करना है, गार्गी ने वही किया और इस तरह अपने अगाध ज्ञान की, अदम्य जिज्ञासा की, बहस करने में अपने सामर्थ्य की छाप भी छोड़ी और एक ऐसा बड़प्पन भी दिखा दिया जिसने गार्गी को याज्ञवल्क्य और जनक से अविभाज्य कर दिया है,ऐसी थी गार्गी ज्ञान और उदारता की ऐसी बेजोड़ प्रतिभाएँ निश्चय ही हमारे देश का गौरव हैं।
Share on Google Plus

About CR Team

Dainik Chamakta Rajasthan to provide lightning fast, reliable and comprehensive informative information to our visitors in the form of news and articles.

0 comments:

Post a Comment