कुम्भ जिसका सम्बन्ध समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश से है

धर्म ग्रंथों के अनुसार देवासुर संग्राम के दौरान इन्हीं 4 स्थानों पर अमृत की बूँदे गिरी थीं।

कुम्भ अर्थात् कलश, जिसका सम्बन्ध समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश से है, तत्वदर्शन की दृष्टि से कुम्भ यानि प्रकृति एवं जीव तत्व का संयोजन है, जो अमृत तत्व है।
इस तत्व को केन्द्र में रखकर विभिन्न मतों-अभिमतों के वैचारिक मंथन का यह पर्व है और इससे निकलने वाला ज्ञानामृत ही कुम्भ-पर्व का प्रसाद है।

हिन्दू धर्म में मान्‍यता है कि किसी भी कुंभ के दौरान पवित्र नदी में स्‍नान या तीन डुबकी लगाने से सभी तरह के पाप धुल जाते हैं और मनुष्‍य को मोक्ष की प्राप्‍ति होती है ।
धर्म ग्रंथों के अनुसार देवासुर संग्राम के दौरान इन्हीं 4 स्थानों पर अमृत की बूँदे गिरी थीं। इससे जुड़ी कथा इस प्रकार है-

कुंभ की कथा
एक बार देवताओं व दानवों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, मदरांचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र को मथा गया, समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले, अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत का घड़ा लेकर प्रकट हुए।
अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं और दैत्यों में उसे पाने के लिए लड़ाई छिड़ गई, ये युद्ध लगातार 12 दिन तक चलता रहा, इस लड़ाई के दौरान पृथ्वी के 4 स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत की बूँदें गिरी।
लड़ाई शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर छल से देवताओं को अमृत पिला दिया, अमृत पीकर देवताओं ने दैत्यों को मार भगाया, काल गणना के आधार पर देवताओं का एक दिन धरती के एक साल के बराबर होता है, इस कारण हर 12 साल में इन चारों जगहों पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।
आस्था, विश्वास, सौहार्द एवं संस्कृतियों के मिलन का पर्व है “कुम्भ”, ज्ञान, चेतना और उसका परस्पर मंथन कुम्भ मेले का वो आयाम है जो आदि काल से ही हिन्दू धर्मावलम्बियों की जागृत चेतना को बिना किसी आमन्त्रण के खींच कर ले आता है।
हिन्दू धर्म में कुम्भ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चारों में से किसी एक पवित्र नदी के तट पर मनाया जाता है, हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और इलाहाबाद में संगम जहां गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं ।

इलाहाबाद का कुम्भ पर्व
यहां सूर्य के मकर और गुरु के वृषभ राशि में होने पर कुंभ मेले का आयोजन होता है-
मकरे च दिवानाथे वृषभे च बृहस्पतौ।
कुंभयोगो भवेत् तत्र प्रयागेह्यति दुर्लभः।।
माघेवृषगते जीवे मकरे चंद्रभास्करौ।
अमावस्यां तदा योगः कुंभाख्यस्तीर्थनायके।।
अर्थ- सूर्य जब मकर राशि में हो तथा गुरु वृषभ राशि में, तब तीर्थराज प्रयाग में कुंभ पर्व का योग होता है। इस प्रकार माघ का महीना हो, अमावस्या की तिथि हो, गुरु वृष राशि पर हो तथा सूर्य-चंद्र मकर राशि पर हो, तब प्रयागराज में अत्यंत दुर्लभ कुंभ योग होता है।
ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है, प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है ।

हरिद्वार के कुम्भ पर्व
पद्मिनीनायके मेषे कुंभराशिगते गुरौ।
गंगाद्वारे भवेद्योगः कुंभनामा तदोत्तमम्।।
अर्थ- कुंभ राशि के गुरु में जब मेष राशि का सूर्य हो, तब हरिद्वार में कुंभ होता है।
हरिद्वार हिमालय पर्वत श्रृंखला के शिवालिक पर्वत के नीचे स्थित है, प्राचीन ग्रंथों में हरिद्वार को तपोवन, मायापुरी, गंगाद्वार और मोक्षद्वार आदि नामों से भी जाना जाता है, हरिद्वार की धार्मिक महत्तान विशाल है,यह हिन्दुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थस्थान है, मेले की तिथि की गणना करने के लिए सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की स्थिति की आवश्यकता होती है, हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है ।

नासिक का कुम्भ पर्व
सिंहराशिगते सूर्ये सिंहराशौ बृहस्पतौ।
गोदावर्या भवेत्कुंभः पुनरावृत्तिवर्जनः।।
अर्थ- सिंह राशि के गुरु में जब सिंह राशि का सूर्य हो, तब गोदावरी तट (नासिक) में कुंभ पर्व होता है।
भारत में 12 में से एक जोतिर्लिंग त्र्यम्बकेश्वर नामक पवित्र शहर में स्थित है, यह स्थान नासिक से 38 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और गोदावरी नदी का उद्गम भी यहीं से हुआ, 12 वर्षों में एक बार सिंहस्थ कुम्भ मेला नासिक एवं त्रयम्बकेश्वर में आयोजित होता है ।
नासिक उन चार स्थानों में से एक है, जहां अमृत कलश से अमृत की कुछ बूंदें गिरी थीं, कुम्भ मेले में सैंकड़ों श्रद्धालु गोदावरी के पावन जल में नहा कर अपनी आत्मा की शुद्धि एवं मोक्ष के लिए प्रार्थना करते हैं, यहां पर शिवरात्रि का त्यौहार भी बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।


उज्जैन का कुम्भ पर्व
मेषराशि गते सूर्ये, सिंहराश्यां बृहस्पतौ।
उज्जयिन्यां भवेत्कुंभ सर्वसौख्य विवर्धनः।।
मेषराशि गते सूर्ये, सिंहराश्यां बृहस्पतौ।
कुंभयोगसविज्ञेयः भुक्तिमुक्ति प्रदायकः।।
अर्थ- सिहं राशि के गुरु में मेष का सूर्य आने पर उज्जयिनी (उज्जैन) में कुंभ पर्व मनाया जाता है।
उज्जैन का अर्थ है विजय की नगरी और यह मध्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर स्थित है, इंदौर से इसकी दूरी लगभग 55 किलोमीटर है, यह शिप्रा नदी के तट पर बसा है, उज्जैन भारत के पवित्र एवं धार्मिक स्थलों में से एक है, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शून्य अंश (डिग्री) उज्जैन से शुरू होता है, महाभारत के अरण्य पर्व के अनुसार उज्जैन 7 पवित्र मोक्ष पुरी या सप्त पुरी में से एक है
उज्जैन के अतिरिक्त शेष हैं अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांचीपुरम और द्वारका. कहते हैं की भगवन शिव नें त्रिपुरा राक्षस का वध उज्जैन में ही किया था ।
उज्जैन में लगता है सिहंस्थ
उज्जैन में लगने वाले कुंभ मेले को सिंहस्थ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दौरान गुरु सिंह राशि में होता है, सिंहस्थ को दुनिया का सबसे बड़ा मेला भी कहा जाता है।
सिंहस्थ पर्व के दौरान विभिन्न तिथियों पर स्नान करने की परंपरा है, ऐसी मान्यता है कि सिंहस्थ के दौरान पवित्र नदी में स्नान करने से पापों का नाश हो जाता है, उज्जैन में चैत्र मास की पूर्णिमा से सिंहस्थ का प्रारंभ होता है, और पूरे मास में वैशाख पूर्णिमा के अंतिम स्नान तक भिन्न-भिन्न तिथियों में सम्पन्न होती है।
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