स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र

स्वामी विवेकानंद जी की सम्पूर्ण जीवन गाथा

स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र - हमारे देश में कई ऐसे महान महापुरूष हुए हैं, जिनके जीवन और विचार से बहुत कुछ सिखा जा सकता है. उनके विचार ऐसे हैं कि निराश व्यक्ति भी अगर उसे पढ़े तो उसे जीवन जीने की नयी राह मिल जाए। उन्ही में से एक हैं स्वामी विवेकानन्द जी, उन्‍होंने रामकृष्‍ण मठ, रामकृष्‍ण मिशन और वेदांत सोसाइटी की नींव रखी.

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद जी का बचपन

स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र
स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता (कोलकता) में हुआ। सन्यास धारण करने से पहले उनका वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था वह नरेन के नाम से भी जाने जाते थे। उनके पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था।

स्वामी विवेकानन्द जी के पिता विश्वनाथ दत्त जी कोलकाता के उच्च न्यायालय में अटॅार्नी-एट-लॉ थे व कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत करते थे। पिता पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखने वालो में से थे। वे अपने पुत्र नरेन्द्र को भी अँग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढर्रे पर चलाना चाहते थे। हालांकि, अपने बच्चों पर एक तेज नजर रखा करते थे और अच्छे शिष्टाचार से थोड़ा सी भी चूक बर्दाश्त नहीं करते थे।

स्वामी विवेकानन्द जी का परिवार धनी सज्जनता व विद्वता के लिए विख्यात था। वे एक विचारक, उदार हृदय, गरीबों के प्रति हमदर्दी रखने वाले,  सामाजिक व धार्मिक विषयों में व्यवहारिक और रचनात्मक नजरिया रखने वाले थे। नरेन्द्र के घर में नियमपूर्वक रोज पूजा-पाठ होता था|

स्वामी विवेकानंद जी का बचपन
स्वामी विवेकानन्द जी की माता भुवनेश्वरी देवी सहज व अत्यंत धार्मिक महिला थीं। स्वामी विवेकानंद का जन्म होने से पूर्व, उनकी मां ने भी अन्य हिन्दू माताओं के सामान धार्मिक शपथ, उपवास, और प्रार्थनाए की, ताकि वह आशीर्वाद के रूप में एक बेटे को प्राप्त कर सके जो उनके वंश को आगे ले जाये। उन्होंने अपने एक रिश्तेदार जो वाराणसी में रह रहे थे उनसे अनुरोध किया की वो वीरसवाड़ा शिव की विशेष पूजा अर्चना करने का अनुरोध किया ताकि वह भगवान शिव से आशीर्वाद प्राप्त कर सके। एक रात उन्होंने सपना देखा कि एक देवता ने उनके बेटे के रूप में जन्म लिया है। जब वह जागी तो वह खुशी से भर गई थी। स्वामी विवेकानन्द जी की माता ने अपने पुत्र  को वीरसवाड़ा शिव के वरदान स्वरुप ही समझा था।

माता भुवनेश्वरी देवी के धार्मिक प्रवृत्ति होने के कारण उन्हें पुराण, रामायण, महाभारत आदि की कथाए सुनने का बहुत शौक था। कथावाचक बराबर इनके घर आते रहते थे भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक नरेन्द्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे पड़ गए। माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण के कारण बालक के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखाई देने लगी थी। ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुक्ता में कभी-कभी वे ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि इनके माता-पिता और कथावाचक पंडितजी तक चक्कर में पड़ जाते थे।
नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से ही तेज़ थी वह पढ़ाई में तेज़ होने के साथ साथ अव्वल दर्जे के शैतान भी थे, अपने साथियों के साथ तो वे शरारत करते ही थे, मौका मिलने पर वे अपने अध्यापकों के साथ भी शरारत करने से नहीं चूकते थे, परन्तु दुर्बल बच्चॊ की सहायता करना उसका परम धर्म सा था|

एक बार की बात है टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे, इधर नरेंद्र ने अपने आस पास बैठे बच्चॊ को खेल कूद की बातो में उलझा लिया, जब टीचर की दृष्टि उन पर पडी तो वो बहुत ही क्रोध में आ गए, उन्होंने तुरंत पढाये जा रहे विषय से प्रश्न पूछना शुरू कर दिया परन्तु उनमे से कोई भी टीचर के सवालो का जवाब नहीं दे पाया| इसके बाद टीचर ने नरेंद्र से पढाये जा रहे विषय के बारे में पूछा, नरेंद्र का दिमाग बहुत ही तीव्र था, कोई भी चीज एक बार सुन जाने पर वह कभी भी नहीं भूलते थे, जब वह अपने पास बैठे बच्चॊ के साथ बात कर रहे थे तब भी वह बीच बीच में कभी-कभी टीचर की बात सुन लिया करते थे| टीचर के पूछे गए प्रश्नो के जबाब में उन्होंने उनको पूरा पाठ ही सुना दिया| टीचर बहुत ही प्रसन्न हुए और नरेंद्र को बैठ जाने के लिए कहा| टीचर ने नरेंद्र के अलावा सभी छात्रों को बेंच पर खड़े होने को कहा, सभी बच्चॊ को खड़ा देख नरेंद्र भी खड़े हो गए|  टीचर ने उनको बैठने को कहा तो उन्होंने  बड़ी शिष्टाचार से कहा सर माफ़ कीजियेगा, मुझे भी सजा जरूर मिलनी चाहिए क्योंकि इनके साथ बाते में भी कर रहा था, ये लोग तो बस मेरी बाते सुन रहे थे| टीचर के मना करने के बाद भी वह सभी बच्चॊ के साथ खड़े ही रहे| यह देख टीचर का दिल भर आया और उनकी आँखों में आंसू आ गए, उन्होंने सभी बच्चो को बैठ जाने को कहा| फिर टीचर ने सभी बच्चो के सामने कहा की तुम्हारा दोस्त नरेंद्र एक दिन इस देश का बहुत ही बड़ा आदमी बनेगा| टीचर की कही हुई यह बात एक दम सही निकली और वह बच्चा जिसका नाम नरेंद्र था, वह विवेकानंद के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर हो गया।

स्वामी विवेकानंद जी की युवा अवस्था एवं श्री रामकृष्ण परमहंस से भेट 

स्वामी विवेकानंद जी
नरेन्द्र एक मेघावी छात्र थे। 1879 में प्रथम श्रेणी में प्रवेशिका इम्तिहान पास कर उन्होंने कलकत्ता के बहुत अच्छे महाविद्यालय- प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया। आगे वे एक दूसरे महाविद्यालय में भी पढ़े। स्वामी विवेकानन्द जी को अंग्रेजी और बांगला - दोनो ही भाषाओं का अच्छा ज्ञान था, इतिहास, विज्ञान और धर्मशास्त्र आदि विषयों में इनकी गहरी रूचि थी। वे विद्याथ्री जीवन में अति क्रियाशील थे और तरह-तरह के क्रियाकलापों में रूचि लेते थे।

भारत की परम्परा के अनुसार व्यायाम एवं कुश्ती से लेकर क्रिकेट जैसे आधुनिक खेल में भी उनकी रूचि थी। बी0ए0 की परीक्षा के बाद उनके पिता उनका ब्याह कराना चाहते थे पर वो गृहस्थ जीवन नहीं जीना चाहते थे।
पिता की मृत्यु ने विवाह के प्रसंग को रोक दिया, पर नरेन्द्र के कन्धो पर पूरे परिवार का बोझ आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। केवल इतना संतोष था कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि - सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

सत्य की खोज में वे ब्रह्मसमाज की सभाओं में आने-जाने लगे। उन्हें सत्य एवं ब्रह्म का साक्षात्कार स्वामी रामकृष्ण परमहंस से मिलने के बाद ही हुआ। स्वामी विवेकानन्द जी की श्री रामकृष्ण परमहंस जी से पहली मुलाकात उनके एक मित्र के घर पर हुई थी। वहीं से गुरु रामकृषण और शिष्य विवेकानंद में एक आकर्षण का अध्याय शुरु हुआ था।

जब कभी भी घर गृहस्थी के काम के कारण नरेंद्र श्री रामकृष्ण परमहंस जी से मिलने दक्षिणेश्वर नहीं जा पाते तो, श्री रामकृष्ण परमहंस जी उदास हो जाते थे। एक बार बहुत दिनों तक जब नरेंद्र उनसे मिलने नही गये, उसी बीच किसी ने उनसे कहा कि, नरेन्द्र का चाल-चलन खराब होने लगा है तो यह बात श्री रामकृष्ण परमहंस जी को सही नहीं लगी और उन्होने अपने भक्तों से कहा कि वह जाकर नरेंद्र का हालचाल पुछ के आए की नरेंद्र  क्यों नहीं आ रहा है?

कुछ भक्त नरेन्द्र के घर गये और उनसे अलग-अलग तरह के सवाल पूछने लगे,  नरेंद्र को लगा कि यह लोग मुझ पर शक करते हैं और गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस जी भी शक करते हैं इसिलिये उन्होंने इन लोगों को मेरे बारे में जानने के लिए भेजा है, ये सोचकर नरेन्द्र को क्रोध आ गया। नरेन्द्र के इस आचरण से जो शिष्य आए थे उन्हे भी लगा कि नरेंद्रनाथ का चरित्र बिगड़ गया है और उन लोगों ने जा कर के श्री रामकृष्ण परमहंस जी से कहा कि, अब तो नरेंद्र का चरित्र बिगड़ गया है, यह सुनकर श्री रामकृष्ण परमहंस जी बहुत नाख़ुश हुए और उन्होंने कहा; “चुप रहो मुझको मां ने बताया है वह कभी भी कुछ भी ऐसा वैसा नहीं कर सकता फिर कभी ऐसी बात कहोगे तो मैं तुम लोगों का मुख तक न देखूंगा।“  नरेंद्र पर श्री रामकृष्ण का कितना अटूट विश्वास था यह समझ पाना मुश्किल है। वहीं नरेन्द्र पर भी रामकृष्ण का जादू इस तरह चढ चुका था कि, वह ज्यादा देर तक उनसे नाराज नही रह सकते थे और न ही उन पर शक कर सकते थे।

नरेन्द्र को कोई भी बन्धन या मोह अपने वश में ना रख सका। चौबीस वर्ष की अवस्था में नरेन्द्रनाथ ने सन्यास ग्रहण कर लिया- वे अपने योग्य गुरू श्री रामकृष्ण परमहंस जी के योग्यतम शिष्य ‘स्वामी विवेकानन्द’ के रूप में ‘जगत प्रसिद्ध’ हुए। स्वामी विवेकानन्द जी ने परिब्राजक के रूप में कश्मीर से कन्याकुमारी तक समस्त भारत का भ्रमण किया। इस अनवरत भ्रमण ने जहाँ स्वामी विवेकानन्द जी के ज्ञान को बढ़ाया, वहीं वे भारत के दीन-दुखियों की विवशता को भी अपनी आँखों से देख सके। स्वामी विवेकानन्द जी जहाँ भी गये लोग उनकी विद्वता, तेज और संकल्प-शक्ति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।

स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र

स्वामी विवेकानंद जी के 101 अनमोल विचार 

  1. उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।
  2. उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो।
  3. ब्रह्माण्ड कि सारी शक्तियां पहले से ही हमारी हैं। वो हम ही हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है!
  4. जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न धाराएँ अपना जल समुद्र में मिला देती हैं उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना गया हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है।
  5. किसी की निंदा ना करें. अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं. अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये।
  6. कभी मत सोचिये कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है. ऐसा सोचना सबसे बड़ा अधर्म है. अगर कोई पाप है, तो वो यही है; ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं.
  7. अगर धन दूसरों की भलाई करने में मदद करे, तो इसका कुछ मूल्य है, अन्यथा यह सिर्फ बुराई का एक ढेर है और इससे जितना जल्दी छुटकारा मिल जाये उतना बेहतर है.
  8. जिस समय जिस काम के लिए प्रतिज्ञा करो, ठीक उसी समय पर उसे करना ही चाहिये, नहीं तो लोगो का विश्वास उठ जाता है।
  9. उस व्यक्ति ने अमरत्त्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता।
  10. हम वो हैं जो हमें हमारी सोच ने बनाया है, इसलिए इस बात का धयान रखिये कि आप क्या सोचते हैं। शब्द गौण हैं. विचार रहते हैं, वे दूर तक यात्रा करते हैं।
  11. जब तक आप खुद पे विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पे विश्वास नहीं कर सकते।
  12. सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।
  13. विश्व एक व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।
  14. जिस दिन आपके सामने कोई समस्या न आये – आप यकीन कर सकते है की आप गलत रास्ते पर है।
  15. यह जीवन अल्पकालीन है, संसार की विलासिता क्षणिक है, लेकिन जो दुसरो के लिए जीते है, वे वास्तव में जीते है।
  16. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
  17. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
  18. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं परलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान मिलना चाहिए।
  19. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
  20. ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है.
  21. हम जितना ज्यादा बाहर जायें और दूसरों का भला करें, हमारा ह्रदय उतना ही शुद्ध होगा, और परमात्मा उसमे बसेंगे।
  22. बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का एक बड़ा रूप है।
  23. जिस क्षण मैंने यह जान लिया कि भगवान हर एक मानव शरीर रुपी मंदिर में विराजमान हैं, जिस क्षण मैं हर व्यक्ति के सामने श्रद्धा से खड़ा हो गया और उसके भीतर भगवान को देखने लगा– उसी क्षण मैं बन्धनों से मुक्त हूँ, हर वो चीज जो बांधती है नष्ट हो गयी और मैं स्वतंत्र हूँ।
  24. जब कोई विचार अनन्य रूप से मस्तिष्क पर अधिकार कर लेता है तब वह वास्तविक भौतिक या मानसिक अवस्था में परिवर्तित हो जाता है।
  25. तुम्हे  अन्दर  से  बाहर  की  तरफ  विकसित  होना  है।  कोई  तुम्हे  पढ़ा  नहीं सकता, कोई  तुम्हे  आध्यात्मिक  नहीं  बना  सकता. तुम्हारी  आत्मा  के आलावा  कोई  और गुरु  नहीं  है।
  26. पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है, और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है।
  27. दिल और दिमाग के टकराव में दिल की सुनो।
  28. किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये –  आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।
  29. स्वतंत्र होने का साहस करो। जहाँ तक तुम्हारे विचार जाते हैं वहां तक जाने का साहस करो और उन्हें अपने जीवन में उतारने का साहस करो।
  30. किसी चीज से डरो मत। तुम अद्भुत काम करोगे। यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है।
  31. प्रेम विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है। इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है। वह जो प्रेम करता है जीता है, जो स्वार्थी है मर रहा है। इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो, क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है, वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो।
  32. सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चे होना। स्वयं पर विश्वास करो।
  33. सच्ची सफलता और आनंद का सबसे बड़ा रहस्य यह है: वह पुरुष या स्त्री जो बदले में कुछ नहीं मांगता, पूर्ण रूप से निस्स्वार्थ व्यक्ति, सबसे सफल है।
  34. जो अग्नि हमें गर्मी देती है, हमें नष्ट भी कर सकती है; यह अग्नि का दोष नहीं है।
  35. बस वही जीते हैं,जो दूसरों के लिए जीते हैं।
  36. शक्ति जीवन है, निर्बलता मृत्यु है. विस्तार जीवन है, संकुचन मृत्यु है. प्रेम जीवन है, द्वेष मृत्यु  है।
  37. हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं। हवा बह रही है; वो जहाज जिनके पाल खुले हैं, इससे टकराते हैं, और अपनी दिशा में आगे बढ़ते हैं, पर जिनके पाल बंधे हैं हवा को नहीं पकड़ पाते। क्या यह हवा की गलती है ?…..हम खुद अपना भाग्य बनाते हैं।
  38. ना खोजो ना बचाओ, जो आता है ले लो।
  39. शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से जो कुछ भी आपको कमजोर बनाता है–उसे ज़हर की तरह त्याग दो।
  40. एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।
  41. कुछ मत पूछो, बदले में कुछ मत मांगो, जो देना है वो दो; वो तुम तक वापस आएगा, पर उसके बारे में अभी मत सोचो।
  42. जो तुम सोचते हो वो हो जायेगा। यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो, तुम कमजोर हो जाओगे; अगर खुद को ताकतवर सोचते हो, तुम ताकतवर हो जाओगे।
  43. मनुष्य की सेवा करो। भगवान की सेवा होगी।
  44. मस्तिष्क की शक्तिया सूर्य की किरणों के समान हैं। जब वो केन्द्रित होती हैं; चमक उठती हैं।
  45. आकांक्षा, अज्ञानता और असमानता– यह बंधन की त्रिमूर्तियां हैं।
  46. भगवान से प्रेम का बंधन वास्तव में ऐसा है जो आत्मा को बांधता नहीं है बल्कि प्रभावी ढंग से उसके सारे बंधन तोड़ देता है।
  47. कुछ सच्चे, इमानदार और उर्जावान पुरुष और महिलाएं; जितना कोई भीड़ एक सदी में कर सकती है उससे अधिक एक वर्ष में कर सकते हैं।
  48. जब लोग तुम्हे गाली दें तो तुम उन्हें आशीर्वाद दो। सोचो, तुम्हारे झूठे दंभ को बाहर निकालकर वो तुम्हारी कितनी मदद कर रहे हैं।
  49. खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।
  50. धन्य हैं वो लोग जिनके शरीर दूसरों की सेवा करने में नष्ट हो जाते हैं।
  51. श्री रामकृष्ण कहा करते थे,” जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक मैं सीखता हूँ वह व्यक्ति या वह समाज जिसके पास सीखने को कुछ नहीं है वह पहले से ही मौत के जबड़े में है।
  52. जीवन का रहस्य केवल आनंद नहीं है बल्कि अनुभव के माध्यम से सीखना है।
  53. कामनाएं समुद्र की भांति अतृप्त है, पूर्ति का प्रयास करने पर उनका कोलाहल और बढ़ता है।
  54. स्त्रियो की स्थिति में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई मार्ग नहीं है।
  55. भय ही पतन और पाप का मुख्य कारण है।
  56. आज्ञा देने की क्षमता प्राप्त करने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को आज्ञा का पालन करना सीखना चाहिए।
  57. प्रसन्नता अनमोल खजाना है छोटी -छोटी बातों पर उसे लूटने न दे।
  58. जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी।
  59. जगत को जिस वस्तु की आवश्यकता होती है वह है चरित्र। संसार को ऐसे लोग चाहिए जिनका जीवन स्वार्थहीन ज्वलंत प्रेम का उदाहरण है। वह प्रेम एक - एक शब्द को वज्र के समान प्रतिभाशाली बना देगा।
  60. हम भले ही पुराने सड़े घाव को स्वर्ण से ढक कर रखने की चेष्टा करे, एक दिन ऐसा आएगा जब वह स्वर्ण वस्त्र खिसक जायेगा और वह घाव अत्यंत वीभत्स रूप में आँखों के सामने प्रकट हो जायेगा।
  61. जब तक लोग एक ही प्रकार के ध्येय का अनुभव नहीं करेंगे, तब तक वे एकसूत्र से आबद्ध नही हो सकते। जब तक ध्येय एक न हो, तब तक सभा, समिति और वक्तृता से साधारण लोगो को एक नहीं किया जा सकता।
  62. यदि उपनिषदों से बम की तरह आने वाला और बम गोले की तरह अज्ञान के समूह पर बरसने वाला कोई शब्द है तो वह है ‘निर्भयता’
  63. अगर आप ईश्वर को अपने भीतर और दूसरे वन्य जीवो में नहीं देख पाते, तो आप ईश्वर को कही नहीं पा सकते।
  64. आदर्श, अनुशासन, मर्यादा, परिश्रम, ईमानदारी और उच्च मानवीय मूल्यों के बिना किसी का जीवन महान नहीं बन सकता।
  65. पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता, एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान से ही हम इन्द्रियों पर संयम रखकर एकाग्रता प्राप्त कर सकते है।
  66. तुम्हारे ऊपर जो प्रकाश है, उसे पाने का एक ही साधन है – तुम अपने भीतर का आध्यात्मिक दीप जलाओ, पाप ऒर अपवित्रता स्वयं नष्ट हो जायेगी। तुम अपनी आत्मा के उददात रूप का चिंतन करो।
  67. संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है असम्भव से आगे निकल जाना।
  68. स्वयं में बहुत सी कमियों के बावजूद अगर में स्वयं से प्रेम कर सकता हुँ तो दुसरो में थोड़ी बहुत कमियों की वजह से उनसे घृणा कैसे कर सकता हुँ।
  69. जन्म, व्याधि, जरा और मृत्यु ये तो केवल अनुषांगिक है, जीवन में यह अनिवार्य है, इसिलिये यह एक स्वाभाविक घटना है।
  70. सुख और दुःख सिक्के के दो पहलु है। सुख जब मनुष्य के पास आता है तो दुःख का मुकुट पहन कर आता है
  71. जीवन का रहस्य भोग में नहीं अनुभव के द्वारा शिक्षा प्राप्ति में है।
  72. विश्व में अधिकांश लोग इसलिए असफल हो जाते है, क्योंकि उनमे समय पर साहस का संचार नही हो पाता। वे भयभीत हो उठते है।
  73. किसी मकसद के लिए खड़े हो तो एक पेड़ की तरह, गिरो तो बीज की तरह। ताकि दुबारा उगकर उसी मकसद के लिए जंग कर सको।
  74. पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाये दूर हो जाती है। इसमें कोई संदेह नहीं की सभी महान कार्य धीरे - धीरे होते है।
  75. लगातार पवित्र विचार करते रहे, बुरे संस्कारो को दबाने के लिए एकमात्र समाधान यही है।
  76. जब तक लाखो लोग भूखे और अज्ञानी है तब तक मै उस प्रत्येक व्यक्ति को गद्दार मानता हुँ जो उनके बल पर शिक्षित हुआ और अब वह उसकी और ध्यान नही देता।
  77. हमे ऐसी शिक्षा चाहिए, जिसमे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैर पर खड़ा हो सके।
  78. मन की एकाग्रता ही समग्र ज्ञान है।
  79. देश की स्त्रीयां विद्या, बुद्धि अर्जित करे, यह मै ह्रदय से चाहता हूँ, लेकिन पवित्रता की बलि देकर यदि यह करना पड़े तो कदापि नहीं।
  80. यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यो ही तुम उस कार्य को बंद करोगे वे तुरंत तुम्हे बदनाम साबित करने से नहीं हिचकिचाएंगे।
  81. जब प्रलय का समय आता है तो समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़कर किनारों को छोड़ अथवा तोड़ जाते है, लेकिन सज्जन पुरुष प्रलय के समान भयंकर आपत्ति एवं विपत्ति में भी अपनी मर्यादा नहीं बदलते।
  82. दुनिया मज़ाक करे या तिरस्कार, उसकी परवाह किये बिना मनुष्य को अपना कर्त्तव्य करते रहना चाहिये।
  83. डर निर्बलता की निशानी है।
  84. जिंदगी का रास्ता बना बनाया नहीं मिलता है, स्वयं को बनाना पड़ता है, जिसने जैसा मार्ग बनाया उसे वैसी ही मंज़िल मिलती है।
  85. शुभ एवं स्वस्थ विचारो वाला ही सम्पूर्ण स्वस्थ प्राणी है।
  86. कर्म का सिद्धांत कहता है – ‘जैसा कर्म वैसा फल’. आज का प्रारब्ध पुरुषार्थ पर अवलम्बित है। ‘आप ही अपने भाग्यविधाता है’.  यह बात ध्यान में रखकर कठोर परिश्रम पुरुषार्थ में लग जाना चाहिये।
  87. इंसान को कठिनाइयों की आवश्यकता होती है क्योंकि सफलता का आनंद उठाने के लिए ये जरूरी है
  88. जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगो से कहो – उससे लोगो को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति बुद्धिमान मनुष्यो के लिए यदि अत्यधिक मात्र में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो – वे जितना शीघ्र बह जाए उतना अच्छा ही है।
  89. खड़े हो जाओ, हिम्मतवान बनो, ताकतवर बन जाओ, सब जवाबदारिया अपने सिर पर ओढ़ लो और समझो की अपने नसीब के रचियता आप खुद हो।
  90. जिंदगी बहुत छोटी है, दुनिया में किसी भी चीज़ का घमंड अस्थाई है पर जीवन केवल वही जी रहा है जो दुसरो के लिए जी रहा है, बाकि सभी जीवित से अधिक मृत है।
  91. आज अपने देश को आवश्यकता है – लोहे के समान मांसपेशियों और वज्र के समान स्नायुओं की। हम बहुत दिनों तक रो चुके, अब और रोने की आवश्यकता नहीं, अब अपने पैरों पर खड़े होओ और मनुष्य बनो।
  92. जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सके, मनुष्य बन सके, चरित्र गठन कर सके और विचारो का सामंजस्य कर सके वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है।
  93. एक नायक बनो, और सदैव कहो – “मुझे कोई डर नहीं है”।
  94. आपको अपने अंदर से बाहर की तरफ विकसित होना पड़ेगा। कोई भी आपको यह नहीं सीखा सकता और न ही कोई आपको आध्यात्मिक बना सकता है। आपकी अपनी अंतरात्मा के अलावा आपका कोई शिक्षक नही है।
  95. हमारा कर्तव्य है की हम हर किसी को उसका उच्चतम आदर्श जीने के संघर्ष में प्रोत्साहित करे और साथ ही साथ उस आदर्श को सत्य के जितना निकट हो सके लेने का प्रयास करे।
  96. इस दुनिया में सभी भेद-भाव किसी स्तर के हैं, ना कि प्रकार के, क्योंकि एकता ही सभी चीजों का रहस्य है।
  97. एक विचार लो उस विचार को अपना जीवन बना लो– उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो यही सफल होने का तरीका है।
  98. तुम फ़ुटबाल के जरिये स्वर्ग के ज्यादा निकट होगे बजाये गीता का अध्ययन करने के।
  99. कभी भी यह न सोचे की आत्मा के लिए कुछ भी असंभव है।
  100. भय और अधूरी इच्छाएं ही समस्त दुःखो का मूल है।
  101. एक शब्द में, यह आदर्श है कि तुम परमात्मा हो।
स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र

सफलता के सूत्र

हर इंसान की नज़र में सफलता और असफलता की व्याख्या विभिन्न होती है, उसके मायने अलग अलग होते है. यानि हर इंसान का एक अलग नजरियां होता है. हर कोई सफलता प्राप्त करना चाहता है और सफलता प्राप्त करने के लिए श्रमसाध्य कार्य करता है। हर क्षेत्र में सब चाहते हैं की वह उसमे महारत हासिल करे. परन्तु कुछ समय उस दिशा में चलने के बाद मन में हताशा व निराशा पैदा होती है. फिर उस हताशा को कम करने के लिए हम कई चीजो का सहारा लेते है जैसे मोटिवेशनल स्पीच, मोटिवेशनल कहानी, कोट्स और भी बहुत कुछ और फिर जोश के साथ अपने काम में लग जाते है. लेकिन फिर कुछ समय बात वही निराशा लौट आती है सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब मेहनत करने के बाद भी हम अपने लक्ष्य में कामयाब नहीं हो पाते. ऐसा क्यों होता है? वह क्या चीज है जो कड़ी मेहनत और लगन के बावजूद भी हमारे लक्ष्यों में बाधा उत्तपन करती है?
स्वामी विवेकानंद की एक कहानी के द्वारा सफलता के सूत्र

एक बार स्वामी विवेकानन्द जी के पास एक आदमी आया जो काफी उदास और परेशान प्रतीत हो रहा था। उसने स्वामी विवेकानन्द जी से कहा की मै हर काम पूरी मेहनत के साथ मन लगा के करता हूँ। लेकिन उसमे कभी पूरी तरह से सफ़ल नहीं हो पाता, मेरे साथ के कई लोग उस काम को पूरा करके मुझसे बहुत आगे निकल चुके है लेकिन में कहीं न कहीं रुक जाता हूँ, मुझे मेरी इस समस्या का कोई समाधान बताएं.

स्वामी विवेकानन्द जी बोले – जाओ पहले मेरे पालतू कुते को घुमा के लाओ तुम्हे तुम्हारे सवाल का जवाब मिल जायेगा कुछ देर बाद जब वह आदमी कुत्ते को लेकर वापस आया तो उसके चेहरे पर अब भी उतावलापन और स्फूर्ति थी जबकि कुत्ता पूरी तरह से थक चूका था। स्वामी विवेकानन्द जी ने उस व्यक्ति से पूछा की तुम अब भी नहीं थके लेकिन यह कुत्ता कैसे इतना थक गया. वह व्यक्ति बोला – स्वामी विवेकानन्द जी मैं तो पुरे रास्ते सीधा सीधा चलता रहा लेकिन यह कुत्ता गली के हर कुत्ते के पीछे भोकता और फिर मेरे पास आ जाता. इसलिए बराबर रास्ता होने के बावजूद यह मुझसे ज्यादा चला और थक गया. स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा की इसी में तुम्हारे प्रशन का उत्तर है, तुम और एक सफल व्यक्ति दोनों एक सामान रास्ते पर चलते है और समान मेहनत करते है लेकिन तुम बीच-बीच में अपनी समानता दुसरो से करने लगते हो, उनकी देखा-देखी करते हो और उनके तरह बनने और उनकी आदते अपनाने की प्रयास करते हो जिसके कारण अपनी खूबी खो देते हो और रास्ते को लंबा बना कर थक जाते हो, यही थकान धीरे-धीरे हताशा व निराशा में बदल जाती है इसलिए अगर किसी काम में पूरी तरह कामयाबी चाहते हो तो उसे लगन और मेहनत के साथ अपने तौर-तरीके से करो न की दूसरे की देखा-देखी से या उनके साथ अपनी तुलना करके आप दुसरो से प्रेरणा ले सकते है या उनसे कुछ सिख सकते है लेकिन उनकी नक़ल करके या उनसे जलन करके अपनी रचनात्मक दृष्टि को खो देते है दुसरो से कभी प्रतिस्पर्धा न करे अपनी गलतियों से सीखे, सफलता और असफलता अपने आपमें कुछ भी नहीं है सफल एक गरीब व्यक्ति भी हो सकता है और असफल एक अमीर व्यक्ति भी. यह हमारा नजरिया तय करता है. इसलिए अपने लक्ष्य खुद तय करे और उसी के प्रत्यक्ष चले ताकि रास्ता लंबा न हो पाए।

लक्ष्य को केंद्र में रखना  

यह बात उस वक़्त की है जब स्वामी विवेकानन्द जी अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे एक नदी से गुजरते समय उन्होंने पुल पर खड़े कुछ लड़कों को पानी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाते देखा किसी भी लड़के का निशाना सटीक नहीं लग रहा था, तब उन्होंने एक लड़के से बन्दूक ली और खुद निशाना लगाने लगे उन्होंने पहला निशाना लगाया और वो बिलकुल सही लगा फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाये और सभी बिलकुल सही लगे ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा, ” आपने ये कैसे कर लिया?”

स्वामी विवेकानन्द जी बोले, “तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा मस्तिष्क उसी एक काम में लगाओ. अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपने लक्ष्य को हासिल करने पर होना चाहिए. तब तुम कभी अपने लक्ष्य से चूकोगे नहीं अगर तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो मेरे देश में बच्चों को ये करना सिखाया जाता है.”

डर का सामना करो

एक बार की बात है बनारस में स्वामी विवेकानन्द जी दुर्गा जी के मंदिर से पूजन कर के बाहर निकल रहे थे की तभी वहां उपस्थित बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया. वे सारे स्वामी विवेकानन्द जी के निकट आने लगे और डराने लगे स्वामी विवेकानन्द जी भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे, पर बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए, और वे उन्हें दौडाने लगे पास खड़ा एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहा था, उसने स्वामी विवेकानन्द जी को रोका और बोला, ” रुको ! उनका सामना करो !”

स्वामी विवेकानन्द जी तत्काल पलटे और बंदरों के ओर बढ़ने लगे, ऐसा करते ही सभी बन्दर भाग खड़े हुए इस घटना से स्वामी विवेकानन्द जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी –” यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो.”

स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र

वेश्या ने स्वामी विवेकानंद जी को कराया था संन्यासी होने की अनुभूति

स्वामी विवेकानन्द जी के अनुयायी देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर कोने-कोने में नजर आते हैं और एक ऐसा संन्यासी जिनका एक वक्तव्य पूरी दुनिया को अपना कायल बनाने के लिए काफी होता था। लेकिन अपने ज्ञान के बल पर दुनिया का दिल जीतने वाले स्वामी विवेकानन्द जी एक बार एक वेश्या के आगे हार गए थे। एक बार जब स्वामी विवेकानन्द जी जयपुर के निकट एक छोटी-सी रियासत के अतिथि बने। कुछ समय वहां रहने के उपरांत जब स्वामी विवेकानन्द जी के विदा लेने का समय आया तो रियासत के राजा ने उनके लिए एक स्वागत समारोह रखा और उस समारोह के लिए उन्होंने बनारस की एक प्रसिद्द वेश्या को बुलाया, जैसे ही स्वामी विवेकानन्द जी को इस बात की खबर मिली कि स्वागत समारोह में एक वेश्या को बुलाया गया है तो वे दुविधा में पड़ गए। आखिरकार एक संन्यासी का वेश्या के समारोह में क्या काम, यह सोचकर उन्होंने समारोह में जाने से मना कर दिया और अपने कक्ष में बैठे रहे। जब यह सुचना वेश्या तक पहुंची कि राजा ने जिस महान विभूति के स्वागत समारोह के लिए उसे बुलाया है, उसकी वजह से वह इस कार्यक्रम में भाग लेना ही नहीं चाहते तो वह काफी दुखी हुई और उसने सूरदास का एक भजन, ‘प्रभु जी मेरे अवगुण चित न धरो…’ गाना शुरू किया।
वेश्या जो भजन गा रही थी, उसके भाव थे कि एक पारस पत्थर तो लोहे के हर टुकड़े को अपने स्पर्श से सोना बनाता है फिर चाहे वह लोहे का टुकड़ा पूजा घर में रखा हो या फिर कसाई के दरवाजे पर पड़ा हो और अगर वह पारस ऐसा नहीं करता अर्थात पूजा घर वाले लोहे के टुकड़े और कसाई के दरवाजे पर पड़े लोहे के टुकड़े में फर्क कर सिर्फ पूजा घर वाले लोहे के टुकड़े को छूकर सोना बना दे और कसाई के दरवाजे पर पड़े लोहे के टुकड़े को नहीं तो वह पारस पत्थर असली नहीं है।

स्वामी विवेकानन्द जी ने वह भजन सुना और उस स्थल पर पहुंच गए जहां वेश्या भजन गा रही थी, उन्होंने देखा कि वेश्या कि आंखों से आंसू छलक रहे थे। स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने एक संस्मरण में इस बात का कथन किया है कि उस दिन उन्होंने अपने जीवन में पहली बार वेश्या को देखा था, लेकिन उनके मन में उसके लिए न कोई प्रलोभन था और न ही घृणा। वास्तव में उन्हें तब पहली बार यह अनुभूति हुई थी कि वे पूर्ण रूप से संन्यासी बन चुके हैं।

अपने संस्मरण में उन्होंने यह भी लिखा है कि इसके पहले जब वे अपने घर से निकलते थे तो उन्हें दो मील चक्कर लगाना पड़ता था, क्योंकि उनके घर के रास्ते में वेश्याओं का एक मोहल्ला पड़ता था और संन्यासी होने के वजह से वहां से गुजरना वे अपने संन्यास धर्म के विपरीत समझते थे, लेकिन उस दिन राजा के स्वागत समारोह में उन्हें एहसास हुआ कि एक असली संन्यासी वही है जो वेश्याओं के मोहल्ले से भी गुजर जाए तो उसे कोई फर्क न पड़े।

स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र

स्वामी विवेकानन्द जी की अमेरिका यात्रा और शिकागो भाषण 

विश्व धर्म संसद में शामिल होने के लिए 31 मई 1893 को स्वामी विवेकानन्द जी मुंबई से अमेरिका के लिए चले। वह समुद्री मार्ग से यात्रा करते हुए श्रीलंका, पनामा, सिंगापुर, हांगकांग, कैंटन, नागाशाकी, ओसाका, टोक्यो, योकोहामा होते हुए जुलाई के अंत में शिकागो पहुंचे। वहां जाकर उन्हें पता चला कि सितम्बर के पहले हफ्ते में धर्म संसद शुरू होगा, लेकिन स्वामी विवेकानन्द जी यह जानकर काफी परेशान हो गए कि यहां सिर्फ जानी-मानी संस्थाओं के वक्तायों को ही बोलने का मौका मिलेगा। इस मामला से निपटने के लिए पहले उन्होंने मद्रास के एक मित्र से ताल्लुक़ किया किन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी, फिर उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से संपर्क किया।

स्वामी विवेकानन्द जी की अमेरिका यात्रा और शिकागो भाषण

प्रोफेसर राइट ने स्वामी विवेकानन्द जी को हार्वर्ड में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया। स्वामी विवेकानन्द जी के हार्वर्ड में दिए भाषण से प्रोफेसर राइट इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने स्वामी विवेकानन्द जी से कहा कि आपसे परिचय पूछना वैसा ही है जैसे सूर्य से यह पूछा जाए कि वह किस रोब से आकाश में चमक रहा है। इसके बाद प्रोफेसर राइट ने धर्म संसद के अध्यक्ष को पत्र लिखा कि इस महापुरुष को किसी संस्था की तरफ से नहीं बल्कि भारत के प्रतिनिधि के तौर पर धर्म संसद में प्रस्तुत होने की आज्ञा देने की कृपा करें| 11 सितम्बर 1893 को शिकागो में धर्म संसद आरंभ हुई ।

धर्म संसद को संबोधित करने की जब स्वामी विवेकानन्द जी की बारी आई तो वे थोड़ा घबरा गए और उनके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगी। वहां उपस्थित लोगों को यहाँ लगा कि भारत से आया यह युवा संन्यासी कुछ बोल नहीं पाएगा, तब अपने आप को संयमित करते हुए स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने गुरु का ध्यान किया और इसके बाद जो उनके मुख से निकला उसे पूरी धर्म संसद सुनती ही रह गई। इस भाषण में स्वामी विवेकानन्द जी के पहले बोल थे –  अमेरिका के मेरे भाइयों और बहनों। स्वामी विवेकानन्द जी के प्रेम के इस मीठे बोल से सभी अचम्भित रह गए और लगभग दो मिनट तक सभागार तालियों की गडगडाहट से गूंजता रहा, इसके बाद स्वामी विवेकानन्द जी ने अध्यात्म और ज्ञान से भरा ऐसा रोचक भाषण दिया कि वह भाषण इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया।

शिकागो विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा दिए गए भाषण में जहाँ वैदिक दर्शन का बोध था वहीँ उसमें दुनिया में शांति से जीने का वर्णन भी छुपा था, अपने भाषण में स्वामी विवेकानन्द जी ने कट्टरतावाद और सांप्रदायिकता पर जमकर चोट किया था। इसके बाद जितने दिन तक धर्म संसद चलती रही स्वामी जी ने दुनिया को हिन्दू धर्म और भारत के बारे में वो ज्ञान दिया जिसने भारत की नई छवि बना दी। धर्म संसद के बाद स्वामी विवेकानन्द जी का न केवल अमेरिका में बल्कि दुनियाभर में आदर बढ़ गया। हाथ बांधे हुए उनकी तस्वीर ‘शिकागो पोज’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया, ऐतिहासिक भाषण की उनकी इस तस्वीर को थॉमस हैरिसन नाम के फोटोग्राफर ने अपने कैमरे में कैद था।

स्वामी विवेकानन्द जी की मृत्‍यु 

स्वामी विवेकानन्द जी ने पूरी संसार में ज्ञान का दीपक जलाया लेकिन उनकी मृत्‍यु 39 साल में हो गई थी। उनके मृत्‍यु की वजह भी अलग-अलग मानी जाती हैं - जितना बड़ा संघर्ष होगा जीत उतनी ही शानदार होगी और जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है - जिंदगी को भाव देने वाले ये शब्‍द स्वामी विवेकानन्द जी के हैं।

25 साल की उम्र में भगवा धारण करने वाले और एक बार पढ़कर बड़े-बड़े ग्रंथ याद कर लेने वाले स्वामी विवेकानन्द जी ने पूरे संसार को ज्ञान का प्रकाश दिखाया और भारतीय विचारधारा से आगाह कराया, लेकिन दुख की बात तो ये है कि 12 जनवरी, 1863 को जन्‍मे स्वामी विवेकानन्द जी ने 4 जुलाई 1902 को ये संसार त्याग दिया था। दुनिया भर में भारतीय अध्यातम का झंडा बुलंद करने वाले स्वामी विवेकानन्द जी 31 बीमारियों से पीड़ित बताए जाते हैं। शायद यही वजह रही कि इस विद्वान का केवल 39 साल की उम्र में मृत्‍यु हो गया। मशहूर बांग्ला लेखक शंकर की पुस्तक 'द मॉन्क एस मैन' में कहा गया है कि निद्रा, यकृत, गुर्दे, मलेरिया, माइग्रेन, मधुमेह व दिल सहित 31 बीमारियों से स्वामी विवेकानन्द जी को जूझना पड़ा था।

शंकर ने स्वामी विवेकानन्द जी की बीमारियों का उल्लेख संस्कृत के एक श्लोक 'शरियाम ब्याधिकमंदिरम' से किया है। इसका मतलब है कि शरीर बीमारियों का मंदिर होता है। इतनी बीमारियों से जूझने के बाद स्वामी विवेकानन्द जी के शरीर की मजबूती पर जोर दिया था। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था कि गीता पढ़ने से अच्छा फुटबॉल खेलना है। स्वामी विवेकानन्द जी की एक बीमारी उनका निद्रा रोग से ग्रसित होना था। स्वामी विवेकानन्द जी ने 29 मई, 1897 को शशिभूषण घोष के नाम एक पत्र लिखा और उसमें कहा था कि मैं अपनी जिंदगी में कभी भी बिस्तर पर लेटते ही नहीं सो सका। स्वामी विवेकानन्द जी मधुमेह से भी पीड़ित थे और उस वक्त इस बीमारी की कारगर सिद्ध होने वाली दवा उपलब्ध नहीं थी।

शंकर लिखते हैं कि स्वामी विवेकानन्द जी ने बीमारियों से निस्तार पाने के लिए उपचार के कई माध्यमों का सहारा लिया। इसमें एलोपैथिक, होम्योपैथिक और आयुर्वेद तीनो की विधाएं शामिल थीं। स्वामी विवेकानन्द जी 1887 में अति तनाव और भोजन की कमी के कारण बीमार हो गए थे। उसी दौरान वह पित्त में पथरी और दस्त से भी पीड़ित हुए। स्वामी विवेकानन्द जी की मृत्‍यु की वजह तीसरी बार दिल का दौरा पड़ना था।

शंकर ने इस बात का भी खुलासा किया कि स्वामी विवेकानन्द जी ने भारत वापस लौटने के लिए अपनी मिस्र की यात्रा में कटौती क्यों की थी, दरअसल स्वामी विवेकानन्द जी ने मिस्र में घोषणा की थी कि 4 जुलाई को उनका देहांत हो जाएगा। स्वामी विवेकानन्द जी का कहना था कि मृत्यु के समय वे भारत में अपने गुरुभाइयों के पास रहना चाहते हैं। वहीं मठकर्मियों का मानना है कि स्वामी विवेकानन्द जी ने महासमाधि ली थी जबकि मेडिकल रिपोर्ट में स्वामी विवेकानन्द जी की मौत की वजह दिमाग की नसें फटना बताई गई है।

शरीर त्‍याग से पहले स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने हाथों से सभी शिष्यों के पाँव धोए। शिष्यों ने संकोच करते हुए स्वामी विवेकानन्द जी से पूछा, 'ये क्या बात है?' स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा, 'भगवान यीशु ने भी अपने हाथों से शिष्यों के पैर धोए थे। 'शिष्यों के मन में विचार आया, 'वह तो उनके जीवन का आख़री दिन था।' इसके बाद सभी ने भोजन किया था, स्वामी विवेकानन्द जी ने थोड़ा विश्राम किया और दोपहर डेढ़ बजे सभी को हॉल में बुला लिया, तीन बजे तक संस्कृत ग्रंथ लघुसिद्धांत कौमुदी पर मनोरंजक शैली में स्वामी विवेकानन्द जी पाठ पढ़ाते रहे। शाम के समय बेलूर मठ में उन्होंने 3 घंटे तक योग किया। शाम के 7 बजे अपने कक्ष में जाते हुए स्वामी विवेकानन्द जी ने किसी से भी उन्हें बाधा ना पहुंचाने की बात कही और रात के 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी मृत्यु की खबर मठ में फैल गई।

स्वामी विवेकानंद एक अद्भुत व्यक्तित्व : सुख और स्वास्थ्य के 101 सूत्र

Swami Vivekananda is a wonderful personality: 101 sources of happiness and health

svaamee vivekaanand ek adbhut vyaktitv : sukh aur svaasthy ke 101 sootr

पूरा नाम –  नरेंद्रनाथ विश्वनाथ दत्त
जन्म तिथि - जनवरी 12,1863
जन्म स्थल - कलकत्ता, पश्चिम बंगाल
पिता - श्री विश्वनाथ दत्त
माता - भुवनेश्वरी देवी
विवाह – विवाह नहीं किया
शिक्षा - कलकत्ता मेट्रोपोलिटन स्कूल, प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता
संस्थानों - रामकृष्ण मठ, रामकृष्ण मिशन, वेदनता सोसाइटी ऑफ़ नई यॉर्क
धर्म - हिंदू
प्रकाशन - कर्मा योग(1896 ), राज योग(1896 ), लेक्टर्स फॉर कोलोंबो टु अल्मोड़ा(1897 ),  माय मास्टर(1901 )
मृत्यु - जुलाई 4, 1902
मृत्यु स्थल  - बेलूर मठ, बेलूर, बंगाल

दैनिक चमकता राजस्थान

Dainik Chamakta Rajasthan e-paper Publishing from Jaipur Rajasthan

सम्बन्धित खबरें पढने के लिए यहाँ देखे
See More Related News
post business listing – INDIA
Follow us: Facebook
Follow us: Twitter
Google Plus
Share on Google Plus

About Team CR

Dainik Chamakta Rajasthan to provide lightning fast, reliable and comprehensive informative information to our visitors in the form of news and articles.

0 comments:

Post a Comment