औरंगज़ेब का सपना चूर करने वाला मराठा साम्राज्य


                              औरंगज़ेब का सपना चूर करने वाला मराठा साम्राज्य

जिस समय औरंगज़ेब लगभग समूचे उत्तर भारत को जीतने के पश्चात दक्षिण में भी अपने पैर जमा चुका था, उसकी इच्छा थी कि पश्चिमी भारत को भी जीतकर वह मुग़ल साम्राज्य को अखिल भारतीय बना दे

परन्तु उसके इस सपने को तोड़ने वाला था मराठा साम्राज्य ।

मराठा साम्राज्य- भारत में मराठा साम्राज्य का संस्थापक शिवाजी को माना जाता है।

दक्षिण भारत में मराठा साम्राज्य की स्थापना करने के पिछे शिवाजी का मुख्य उद्देश्य एक स्वतंत्र हिंदू राज्य की स्थापना करना था।

शिवाजी- जन्म- 10 अप्रेल, 1627

जन्म स्थान- शिवनेर दुर्ग (महाराष्ट्र)

शासन काल- (1674-1680)

पिता- शाहजी भोंसले

माता- जीजा बाई

दादा- कोणदेव (शिवाजी के जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव उनके दादाजी का पड़ा)

गुरु- रामदास (आध्यात्मिक गुरु)

समकालीन- संत तुकाराम (महाराष्ट्र)

राज्याभिषेक/राजतिलक- कुल दो बार

शिवाजी का प्रथम राजतिलक 16 जून, 1674 को रायगढ़ (महाराष्ट्र) के किले में पंडित विश्वेश्वर गंगाभट्ट के द्वारा किया गया था।

द्वितीय राजतिलक- शिवाजी का द्वितीय राजतिलक 4 अक्टुबर, 1674 को रायगढ़ (महाराष्ट्र) के किले में तांत्रिक या जादूटोणा विधि के द्वारा बंगाल के तांत्रिक निश्चलपुरी गोस्वामी के द्वारा किया गया था।

अष्टप्रधान/अष्ट दिग्गज- शिवाजी के दरबार में आठ विद्वानों की मंडली रहती थी जिन्हे अष्ट दिग्गज कहते थे, जिनमें प्रमुख पद निम्नलिखित है।

1. पेशवा-यह अष्टप्रधान में सर्वोच्च पद था जो की राजा अनुपस्थिति में प्रजा के कार्य करता था।

2. आमात्य/मजूमदार-यह वित्त मंत्री का पद था।

3. दुबीर/सुमंत-यह विदेश मंत्री का पद था।

4. वाकिया वानिस-यह दरबार की दैनिक क्रियाए लिखता था।

औरंगजेब-मुगल बादशाह शिवाजी का सबसे बड़ा शत्रु था।

रायगढ़-शिवाजी की राजधानी थी।

अफजल खान-इसी व्यक्ति या सैनापति के द्वारा सन् 1680 में राजगढ़ के किले में ही शिवाजी की हत्या कर दि गयी थी।

संभाजी -शिवाजी की मृत्यु के बाद अगला मराठा शासक शिवाजी का पुत्र संभाजी गद्दी पर बैठा था।

ताराबाई-यह शिवाजी के पुत्र राजाराम की विधवा पत्नी थी जिसने मुगलों का विद्रोह किया था।

बालाजी विश्वनाथ-यह मराठा साम्राज्य में प्रथम पेशवा बना था जिसे मराठा साम्राज्य का दुसरा संस्थापक भी कहते है।

पानीपत का तीसरा युद्ध-यह युद्ध सन् 1761 में मराठा शासक बालाजी बाजीराव तथा अफगानी शासक अहमदशाह अब्दाली के बीच हुआ था, इस युद्ध के बाद भारत में मराठा साम्राज्य का विनास/पतन हो गया था।

विलियम स्मिथ-इस अंग्रेजी इतिहासकार ने शिवाजी की सैना को डाकुओं की सेना कहा था।

                                  संभाजी महाराज का शासनकाल -

शिवाजी की मृत्यु के पश्चात उनके पुत्र संभाजी राजा बने और उन्होंने बीजापुर सहित मुगलों के अन्य ठिकानों पर हमले जारी रखे, 1682 में औरंगजेब ने दक्षिण में अपना ठिकाना बनाया, ताकि वहीं रहकर वह फ़ौज पर नियंत्रण रख सके और पूरे भारत पर साम्राज्य का सपना सच कर सके।

उस बेचारे को क्या पता था कि अगले 25 साल वह दिल्ली वापस नहीं लौट सकेगा और दक्षिण भारत फतह करने का सपना उसकी मृत्यु के साथ ही दफ़न हो जाएगा, हालाँकि औरंगजेब की शुरुआत तो अच्छी हुई थी, और उसने 1686 और 1687 में बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर अपना कब्ज़ा कर लिया था, इसके बाद उसने अपनी सारी शक्ति मराठाओं के खिलाफ झोंक दी, जो उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए थे।

                             औरंगज़ेब का सपना चूर करने वाला मराठा साम्राज्य

मुगलों की भारी भरकम सेना की पूरी शक्ति के आगे धीरे-धीरे मराठों के हाथों से एक-एक करके किले निकलने लगे और मराठों ने ऊँचे किलों और घने जंगलों को अपना ठिकाना बना लिया।

औरंगजेब ने विपक्षी सेना में रिश्वत बाँटने का खेल शुरू किया और गद्दारों की वजह से संभाजी महाराज को संगमेश्वर के जंगलों में 1689 में औरंगजेब ने पकड़ लिया।

औरंगजेब ने संभाजी से इस्लाम कबूल करने को कहा, संभाजी ने औरंगजेब से कहा कि यदि वह अपनी बेटी की शादी उनसे करवा दे तो वह इस्लाम कबूल कर लेंगे, यह सुनकर औरंगजेब आगबबूला हो उठा।

उसने संभाजी की जीभ काट दी और आँखें फोड़ दीं, संभाजी को अत्यधिक यातनाएँ दी गईं, लेकिन उन्होंने अंत तक इस्लाम कबूल नहीं किया और फिर औरंगजेब ने संभाजी की हत्या कर दी।

औरंगजेब लगातार किले फतह करता जा रहा था, संभाजी का दुधमुंहे बच्चा “शिवाजी द्वितीय” अब आधिकारिक रूप से मराठा राज्य का उत्तराधिकारी था ।

औरंगजेब ने इस बच्चे का अपहरण करके उसे अपने हरम में रखने का फैसला किया ताकि भविष्य में सौदेबाजी की जा सके ।

चूँकि औरंगजेब “शिवाजी” नाम से ही चिढता था, इसलिए उसने इस बच्चे का नाम बदलकर शाहू रख दिया और अपनी पुत्री जीनतुन्निसा को सौंप दिया कि वह उसका पालन-पोषण करे।

औरंगजेब यह सोचकर बेहद खुश था कि उसने लगभग मराठा साम्राज्य और उसके उत्तराधिकारियों को खत्म कर दिया है और बस अब उसकी विजय निश्चित ही है लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं पाया।

संभाजी की मृत्यु और उनके पुत्र के अपहरण के बाद संभाजी का छोटा भाई राजाराम ने मराठा साम्राज्य के सूत्र अपने हाथ में लिए ।

उन्होंने महसूस किया कि इस क्षेत्र में रहकर मुगलों की इतनी बड़ी सेना से लगातार युद्ध करना संभव नहीं है, इसलिए उन्होंने अपने पिता शिवाजी से प्रेरणा लेकर, अपने विश्वस्त साथियों के साथ लिंगायत धार्मिक समूह का भेष बदला और गाते-बजाते आराम से सुदूर दक्षिण में जिंजी के किले में अपना डेरा डाल दिया ।

इसके बाद चमत्कारिक रूप से राजाराम ने जिंजी के किले से ही मुगलों के खिलाफ जमकर गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत की, उस समय उनके सेनापति थे रामचंद्र नीलकंठ, राजाराम की सेना ने छिपकर वार करते हुए एक वर्ष के अंदर मुगलों की सेना के दस हजार सैनिक मार गिराए और उनका लाखों रूपए खर्च करा दिया, औरंगज़ेब बुरी तरह परेशान हो उठा ।

दक्षिण की रियासतों से औरंगज़ेब को मिलने वाली राजस्व की रकम सिर्फ दस प्रतिशत ही रह गई थी, क्योंकि राजाराम की सफलता को देखते हुए बहुत सी रियासतों ने उस गुरिल्ला युद्ध में राजाराम का साथ देने का फैसला किया ।

औरंगज़ेब के जनरल जुल्फिकार अली खान ने जिंजी के इस किले को चारों तरफ से घेर लिया था, परन्तु पता नहीं किन गुप्त मार्गों से फिर भी राजाराम अपना गुरिल्ला युद्ध लगातार जारी रखे हुए थे, यह सिलसिला लगभग आठ वर्ष तक चला ।

अंततः औरंगज़ेब का धैर्य जवाब दे गया और उसने जुल्फिकार से कह दिया कि यदि उसने जिंजी के किले पर विजय हासिल नहीं की तो गंभीर परिणाम होंगे ।

जुल्फिकार ने नई योजना बनाकर किले तक पहुँचने वाले अन्न और पानी को रोक दिया, राजाराम ने जुल्फिकार से एक समझौता किया कि यदि वह उन्हें और उनके परिजनों को सुरक्षित जाने दे तो वे जिंजी का किला समर्पण कर देंगे ।

ऐसा ही किया गया और राजाराम 1697 में अपने समस्त कुनबे और विश्वस्तों के साथ पुनः महाराष्ट्र पहुँचे और उन्होंने सातारा को अपनी राजधानी बनाया ।

82 वर्ष की आयु तक पहुँच चुका औरंगज़ेब दक्षिण भारत में बुरी तरह उलझ गया था और थक भी गया था, अंततः सन 1700 में उसे यह खबर मिली की किसी बीमारी के कारण राजाराम की मृत्यु हो गई है ।

अब मराठाओं के पास राज्याभिषेक के नाम पर सिर्फ विधवाएँ और दो छोटे-छोटे बच्चे ही बचे थे, औरंगजेब पुनः प्रसन्न हुआ कि चलो अंततः मराठा साम्राज्य समाप्त होने को है ।

लेकिन वह फिर से गलत साबित हुआ, क्योंकि 25 वर्षीय रानी ताराबाई ने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए और अपने अपने चार वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय को राजा घोषित कर दिया ।

अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ताराबाई ने मराठा सरदारों को साम-दाम-दण्ड-भेद सभी पद्धतियाँ अपनाते हुए अपनी तरफ मिलाया और राजाराम की दूसरी रानी राजसबाई को जेल में डाल दिया ।

अगले सात वर्ष में ताराबाई ने तत्कालीन सबसे शक्तिशाली बादशाह अर्थात औरंगजेब के खिलाफ अपना युद्ध जारी रखा ।

वह लगातार आक्रमण करतीं, अपनी सेना को उत्साहित करतीं और किले बदलती रहतीं, ताराबाई ने भी औरंगजेब की रिश्वत तकनीक अपना ली और विरोधी सेनाओं के कई गुप्त राज़ मालूम कर लिए ।

धीरे-धीरे ताराबाई ने अपनी सेना और जनता का विश्वास अर्जित कर लिया, औरंगजेब जो कि थक चुका था, उसके सामने मराठों की शक्ति पुनः दिनोंदिन बढ़ने लगी थी ।

ताराबाई ने औरंगजेब को जिस रणनीति से सबसे अधिक चौंकाया और तकलीफ दी, वह थी गैर-मराठा क्षेत्रों में घुसपैठ, चूँकि औरंगजेब का सारा ध्यान दक्षिण और पश्चिमी घाटों पर लगा था, इसलिए मालवा और गुजरात में उसकी सेनाएँ कमज़ोर हो गई थीं ।

ताराबाई ने सूरत की तरफ से मुगलों के क्षेत्रों पर आक्रमण करना शुरू किया और धीरे-धीरे (आज के पश्चिमी मप्र) आगे बढ़ते हुए कई स्थानों पर अपनी वसूली चौकियां स्थापित कर लीं. ताराबाई ने इन सभी क्षेत्रों में अपने कमाण्डर स्थापित कर दिए और उन्हें सुभेदार, कमाविजदार, राहदार, चिटणीस जैसे विभिन्न पदानुक्रम में व्यवस्थित भी किया ।

मराठाओं को खत्म नहीं कर पाने की कसक लिए हुए सन 1707 में 89 की आयु में औरंगजेब की मृत्यु हुई ।

वह बुरी तरह टूट और थक चुका था,अंतिम समय पर उसने औरंगाबाद में अपना ठिकाना बनाने का फैसला किया, जहाँ उसकी मौत भी हुई और आखिर अंत तक वह दिल्ली नहीं लौट सका ।

औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगलों ने उसके द्वारा अपहृत किये हुए पुत्र शाहू को मुक्त कर दिया, ताकि सत्ता संघर्ष के बहाने मराठों में फूट डाली जा सके ।

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