अगर हर इच्छा पूरी करनी है तो महाशिवरात्र‍ि पर ये जरूर करना

अगर हर इच्छा पूरी करनी है तो महाशिवरात्र‍ि पर ये जरूर करना - महाशिवरात्र‍ि  देवो के देव महादेव अर्थात शिव जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला हिंदुओं का एक धार्मिक त्योहार है, जिसे फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है।
अगर हर इच्छा पूरी करनी है तो महाशिवरात्र‍ि पर ये जरूर करना

इस दिन शिव में श्रद्धा रखने वाले लोग व्रत-उपवास रखते हैं और विशेष रूप से महादेव की आराधना करते हैं। कई लोग इस खास मौके पर रूद्राभिषेक का भी आयोजन करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया रूद्राभिषेक काफी फलित होता है।

रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक। महादेव को रुद्र कहा गया है और उनका रूप शिवलिंग में देखा जाता है। अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा अभिषेक करना।


अभिषेक के कई रूप तथा प्रकार होते हैं। महादेव को प्रसन्न करने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है रुद्राभिषेक करना या फिर श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा कराना। कहा जाता है अपनी जटा में गंगा को धारण करने से महादेव को जलधारा अति प्रिय है।



वैसे तो प्रत्येक माह में एक शिवरात्र‍ि होती है परन्तु साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी को आने वाली महाशिवरात्रि को ही सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

इस दिन शिव मंदिरों में बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ती है जो महादेव के दर्शन-पूजन कर खुद को सौभाग्यशाली मानती है।

माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। वे स्वयम्भू के रूप में जाने जाते हैं, जिसका अर्थ है "स्वयं उत्पन्न"। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग जो महादेव का विशालकाय स्वरूप माना जाता है से उदय से हुआ।

महाशिवरात्र‍ि को लेकर देवो के देव महादेव से जुड़ी कई अन्य मान्यताएं भी प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि महाशिवरात्र‍ि के दिन ही ब्रम्हा के रूद्र रूप में मध्यरात्र‍ि को महादेव का अवतरण हुआ था।



वहीं यह भी मान्यता है कि इसी दिन महादेव ने तांडव कर अपना तीसरा नेत्र खोला था और ब्रम्हांड को इस नेत्र की ज्वाला से समाप्त किया था। इसके अलावा कई स्थानों पर इस दिन को भगवान शिव के विवाह से भी जोड़ा जाता है और यह माना जाता है कि इसी दिन देवो के देव महादेव और मां पार्वती का विवाह हुआ था।



शिव पुराण के अनुसार माना जाता है की महाशिवरात्र‍ि के दिन महादेव का विभिन्न पवित्र वस्तुओं से पूजन एवं अभिषेक किया जाना चाहिए जैसे जल, दुग्ध, बिल्वपत्र,  धतूरा,  अबीर,  गुलाल,  बेर,  उम्बी,  दही, शक्कर, गंगाजल इत्यादि| माना जाता है की महादेव को भांग बेहद प्रिय है अत: कई लोग उन्हें भांग भी चढ़ाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार देवी सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, सीता और गायत्री देवी ने भी मासिक शिवरात्रियों का व्रत किया था और शिव कृपा से अनंत फल प्राप्त किया था।

महाशिवरात्र‍ि के दिन भक्तगण सुबह सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र ग्रहण कर शिवलिंग की तीन या सात बार परिक्रमा करते हैं और फिर शिवलिंग पर पानी या दूध चढ़ाते हैं।

शिव लिंग पर जल, दूध और शहद के साथ अभिषेक करते है।
शिव लिंग पर सिन्दूर या चन्दन महादेव को अर्पित किया जाता है जो पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है|
शिव लिंग पर बेर या बेल के पत्ते अर्पित किए जाते है जो आत्मा की शुद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं|
शिव लिंग पर फल अर्पित किए जाते है जो दीर्घायु और इच्छाओं की संतुष्टि को दर्शाते हैं|
शिव लिंग पर धूप – दीप, धन, अनाज अर्पित किए जाते है जो ज्ञान की प्राप्ति के लिए अनुकूल है|
शिव लिंग पर पान के पत्ते भी अर्पित किए जाते है जो सांसारिक सुखों के साथ संतोष अंकन करते हैं।
दिनभर उपवास रखकर पूजन करने के बाद शाम के समय फलाहार किया जाता है।

महादेव को भोलेनाथ कहते है महादेव साधारण पूजा से प्रसन्न हो जाते हैं। भोलेनाथ पर सच्चे मन से केवल एक लोटा जल चढ़ाने से ही महादेव इंसान की मुराद पूरी कर देते है।

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार, इस दिन जो भी लोग इस पर्व को पूरी श्रद्धा से मनाते हैं और निष्ठापूर्वक अपने व्रत को पूरा करते हैं, उनकी मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं।



कहते हैं महाशिवरात्रि व्रत करने से चारित्रिक दोष और बुरी आदतें, जैसे क्रोध, मद, लोभ, अहंकार, मिथ्याभिमान और दूसरों के प्रति गलत सोच आदि दूर हो जाती हैं.

मंत्र
शिव पंचाक्षरी मंत्र - नम: शिवाय।
शिव षडाक्षरी मंत्र - ॐ नम: शिवाय।
मृत्युंजय मंत्र - ॐ जूं स:।
महामृत्युंजय मंत्र - ॐ त्र्यम्बकम् यजामहे, सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्। उर्वारु‍कमिव बन्धनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।
शिवजी का मंत्र - कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारं| सदा वसन्तं ह्रदयाविन्दे भंव भवानी सहितं नमामि॥
इन मंत्रों में से जो अच्‍छा लगे, उसका जाप करे तथा उसी से पूजन करें|

शिवजी की आरती 

जय शिव ओंकारा प्रभु हर ॐ शिव ओंकारा| ब्रम्हा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा....
एकानन चतुरानन पंचांनन राजे| हंसासंन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
दो भुज चारु चतुर्भज दस भुज अति सोहें| तीनों रुप निरखता त्रिभुवन जन मोहें॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
अक्षमाला, बनमाला, रुण्ड़मालाधारी| चंदन, मृदमग सोहें, भाले शशिधारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा....
श्वेताम्बर,पीताम्बर, बाघाम्बर अंगें| सनकादिक, ब्रम्हादिक, भूतादिक संगें||
ॐ जय शिव ओंकारा...
कर के मध्य कमड़ंल चक्र, त्रिशूल धरता| जगकर्ता, जगभर्ता, जगसंहारकर्ता॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
ब्रम्हा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका|प्रवणाक्षर मध्यें ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रम्हचारी| नित उठी भोग लगावत महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावें| कहत शिवानंद स्वामी जपत निरंतर स्वामी मनवांछित फल पावें॥
ॐ जय शिव ओंकारा...

शिव स्तुति मंत्र
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।1।

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।2।

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।3।

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।4।

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।5।

न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।6।

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।7।

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।8।

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।9।

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।10।

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।11।

शिव तांडव स्तोत्रम् ||
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले, गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं, चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ||||

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी, विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि |
धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ||||

धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुरस् फुरद् दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे |
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ||||

लता भुजङ्ग पिङ्गलस् फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्ब कुङ्कुमद्रवप् रलिप्तदिग्व धूमुखे |
मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ||||

सहस्र लोचनप्रभृत्य शेष लेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूस राङ्घ्रि पीठभूः |
भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः ||||

ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्प नायकम् |
सुधा मयूखले खया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोज टालमस्तु नः ||||

कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुती कृतप्रचण्ड पञ्चसायके |
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम |||||

नवीन मेघ मण्डली निरुद् धदुर् धरस्फुरत्- कुहू निशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः |
निलिम्प निर्झरी धरस् तनोतु कृत्ति सिन्धुरः कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद् धुरंधरः ||||

प्रफुल्ल नीलपङ्कज प्रपञ्च कालिम प्रभा- वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छि दांध कच्छिदं तमंत कच्छिदं भजे ||||

अखर्व सर्व मङ्गला कला कदंब मञ्जरी रस प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त कान्ध कान्त कं तमन्त कान्त कं भजे ||१०||

जयत् वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ||११||

स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्- गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः ( समं प्रवर्तयन्मनः) कदा सदाशिवं भजे ||१२||

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ||१३||

इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ||१४||

पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतं यः शंभु पूजन परं पठति प्रदोषे |

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः ||१५||


पूजन में पहले ध्यान, आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पंचामृत स्नान, शुद्धोदक जल स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उपवस्त्र, चंदन, अक्षत, पुष्प, पुष्प माला, धूप-दीप, नैवेद्य नीराजन, पुष्पांजलि, परिक्रमा, क्षमा-प्रार्थना इत्यादि मूल मंत्र का प्रयोग करें।

भोलेनाथ को बिल्वपत्र, भांग, अर्क पुष्प, धतूरे के पुष्प-फल भी चढ़ाए जाते हैं। जो वस्तु कम हो, उस वस्तु की जगह अक्षत का प्रयोग करें।



यदि महाशिवरात्रि के दिन महादेव को प्रसन्न करने के लिए अपनी राशि के अनुसार आराधना की जाए तो अत्याधिक लाभ होगा। माना जाता है की यदि कुंडली में ग्रह दोष हों और कार्यों में परेशानियां आ रही हैं तो राशि अनुसार देवों के देव महादेव के पूजन से सभी कष्टों का अंत होता है।

मेष - रक्तपुष्प से पूजन करें तथा अभिषेक शहद से करें। 'ॐ नम: शिवाय' का जप करें।
वृषभ - श्वेत पुष्प तथा दुग्ध से पूजन-अभिषेक करें। महामृत्युंजय का मंत्र जपें।
मिथुन - अर्क, धतूरा तथा दुग्ध से पूजन-अभिषेक करें। शिव चालीसा पढ़ें।
कर्क - श्वेत कमल, पुष्प तथा दुग्ध से पूजन-अभिषेक करें। शिवाष्टक पढ़ें।
सिंह - रक्त पुष्प तथा पंचामृत से पूजन-अभिषेक करें। शिव महिम्न स्त्रोत पढ़ें।
कन्या - हरित पुष्प, भांग तथा सुगंधित तेल से पूजन-अभिषेक करें। शिव पुराण में वर्णित कथा का वाचन करें।
तुला - श्वेत पुष्प तथा दुग्ध धारा से पूजन-‍अभिषेक करें। महाकाल सहस्त्रनाम पढ़ें।
वृश्चिक - रक्त पुष्प तथा सरसों तेल से पूजन-‍अभिषेक करें। शिव जी के 108 नामों का स्मरण करें।
धनु - पीले पुष्प तथा सरसों तेल से पूजन-‍अभिषेक करें। 12 ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करें।
मकर - नीले-काले पुष्प तथा गंगाजल से पूजन-‍अभिषेक करें। शिव पंचाक्षर मंत्र का जप करें।
कुंभ – जामुनिया या नीले पुष्प तथा जल से पूजन-‍अभिषेक करें। शिव षडाक्षर मंत्र का 11 बार स्मरण करें।
मीन - पीले पुष्प तथा मीठे जल से पूजन-‍अभिषेक करें। रावण रचित शिव तांडव का पाठ करें।


देवो के देव महादेव को योग परंपरा का आदि अर्थात प्रथम गुरु माना जाता है। परंपरा के अनुसार, इस रात को ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है जिससे मानव प्रणाली में ऊर्जा की एक शक्तिशाली प्राकृतिक लहर बहती है। इसे भौतिक और आध्यात्मिक रूप से लाभकारी माना जाता है इसलिए इस रात जागरण की सलाह भी दी जाती है जिसमें शास्त्रीय संगीत और नृत्य के विभिन्न रूप में प्रशिक्षित विभिन्न क्षेत्रों से कलाकार पूरी रात प्रदर्शन करते हैं।

शिवरात्रि को महिलाओं के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। विवाहित महिलाएँ अपने पति के सुखी जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं व अविवाहित महिलाएं भगवान शिव, जिन्हें आदर्श पति के रूप में माना जाता है जैसे पति के लिए प्रार्थना करती हैं।

शिवरात्रि सम्पूर्ण भारत मे मनाया जाने वाला पर्व है| उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर सबसे सम्माननीय भगवान शिव का मंदिर है यहाँ हर वर्ष शिव भक्तों की एक बड़ी मण्डली महा शिवरात्रि के दिन पूजा-अर्चना के लिए आती है।



जेओनरा,सिवनी के मठ मंदिर में व जबलपुर के तिलवाड़ा घाट नामक दो अन्य स्थानों पर भी यह त्योहार बहुत धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सभी मंदिरों में व्यापक रूप से मनाई जाती है।

कश्मीरी ब्राह्मणों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यहाँ यह पर्व शिव और पार्वती के विवाह के रूप में हर घर में मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के उत्सव के 3-4 दिन पहले शुरू हो जाता है और उसके दो दिन बाद तक जारी रहता है।

महाशिवरात्रि को नेपाल में व विशेष रूप से पशुपति नाथ मंदिर में व्यापक रूप से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर काठमांडू के पशुपतिनाथ मन्दिर पर भक्तजनों की भीड़ लगती है। इस अवसर पर भारत समेत विश्व के विभिन्न स्थानों से जोगी, एवम्‌ भक्तजन इस मन्दिर में आते हैं।

बांग्लादेश में हिंदू महाशिवरात्रि मनाते हैं। वे भगवान शिव के दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने की उम्मीद में व्रत रखते हैं। कई बांग्लादेशी हिंदू इस खास दिन चंद्रनाथ धाम (चिटगांव) जाते हैं। बांग्लादेशी हिंदुओं की मान्यता है कि इस दिन व्रत व पूजा करने वाले स्त्री/पुरुष को अच्छा पति या पत्नी मिलती है। इस वजह से ये पर्व यहाँ खासा प्रसिद्ध है।

देवो के देव महादेव के अनेक धार्मिक स्थल है किन्तु उनमे से बारह ज्योतिर्लिंग को मुख्य रूप से स्थान दिया जाता है।

  1. सोमनाथ - यह शिवलिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र नगर में अरब सागर के तट स्थित है| इस ज्योतिर्लिंग के बारे में कहा जाता है कि यह हर सृष्टि में यहां स्थित रहा है।
  2. श्री शैल मल्लिकार्जुन - श्री शैल मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आंध्रप्रदेश के पश्चिमी भाग में कुर्नूल जिले के नल्लामल्ला जंगलों के मध्य श्री सैलम पहाड़ी पर कृष्णा नदी के किनारे विराजमान हैं। इसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं।
  3. महाकाल - उज्जैन के अवंति नगर में स्थापित महाकालेश्वर शिवलिंग है जहां महादेव ने दैत्यों का नाश किया था। यह एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है।
  4. ओंकारेश्वर - ओमकार का उच्चारण सर्वप्रथम स्रष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से हुआ था. मध्य प्रदेश के प्रमुख शहर इंदौर से 77 किमी की दुरी पर है. एवं यह ऐसा एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित है. भगवान शिव प्रतिदिन तीनो लोकों में भ्रमण के पश्चात यहाँ आकर विश्राम करते हैं. अतएव यहाँ प्रतिदिन भगवान शिव की विशेष शयन व्यवस्था एवं आरती की जाती है तथा शयन दर्शन होते हैं.
  5. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग - यह शिवलिंग गुजरात प्रान्त के द्वारकापुरी से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित है।
  6. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग - यह शिवलिंग झारखंड के देवघर में स्थित है। इसे बैजनाथ धाम और रावणेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता हैं. इस शिवलिंग को 'कामना लिंग' भी कहते हैं.
  7. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग - यह शिवलिंग महाराष्ट्र के पूणे से लगभग 110 किमी दूर सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थापित है। इसे मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है।
  8. त्र्यंम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग - यह शिवलिंग नासिक, महाराष्ट्र से 25 किलोमीटर दूर त्र्यंम्बकेश्वर में स्थापित है। तीन नेत्रों वाले भगवान शिवशंभु के यहाँ विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले) कहा जाता है| यह एक मात्र ऐसा स्थान है जहा ब्रह्मा विष्णु तथा शिव तीनो विराजमान है|
  9. घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग - यह शिवलिंग ग्राम शिवाड़ (शिवालय) जिला-सवाईमाधोपुर (राजस्थान) में स्थित है 
  10. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग - केदारनाथ हिमालय का सबसे दुर्गम ज्योतिर्लिंग है जो हरिद्वार से 150 मिल की दूरी पर स्थित है।
  11. विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग - यह शिवलिंग बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित है 
  12. रामेश्वरम्‌ - यह शिवलिंग त्रिचनापल्ली (मद्रास) समुद्र तट पर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित है|


महाशिवरात्रि से संबधित कई पौराणिक कथायें है - 

समुद्र मंथन - महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव ने समुद्र मंथन के समय बाहर आया कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था और सम्पूरण ब्रहमांड को नष्ट होने से बचाया था|

शिकारी कथा - एक बार माता पार्वती ने महादेव से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई - 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था।

पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था,  परन्तु वह उसका ऋण समय पर न चुका सका था। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'



शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव - संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की।

शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट चला गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था।

शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसके बारे मे पता नही था।

पड़ाव बनाते समय शिकारी ने जो टहनियां व बेलपत्र तोड़े वे संयोगवश शिवलिंग पर गिरे थे| इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची।

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं।

मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।'  शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था।

उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे शिकारी'  मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं।

 "हे शिकारी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।"

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं।



यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी।

अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया।

भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसु बहने लगे। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।



देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है।

शिव का अर्थ ही कल्याण होता है। उन निरीह प्राणियों का कल्याण करने के कारण ही वह शिव तत्व को जान पाया तथा उसका शिव से साक्षात्कार हुआ।

परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है। मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि।

वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही 'शिवरात्रि' है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है।
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