वीर रस की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान

                                                  वीर रस की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान


कविता की लेखक सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 (नागपंचमी) को प्रयाग (उ.प्र.) के पास ग्राम निहालपुर में ठाकुर रामनाथ सिंह के घर में हुआ था।

प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा प्रयाग में उनकी सहपाठी थीं, दोनों ने ही आगे चलकर खूब प्रसिद्धि प्राप्त की।

सुभद्रा कुमारी चौहान एक प्रतिष्ठित भारतीय कवयित्री थी, जिनकी रचनाएं हमें भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है, उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना झांसी की रानी है, जिसमें झांसी की रानी, ​​लक्ष्मी बाई के जीवन का वर्णन किया गया था।

सुभद्रा कुमार चौहान की भाषा पर अच्‍छी पकड़ और सरलता ही उन्‍हें अन्‍य कवयित्री से अलग बनाता है, उनकी कहानियों की भाषा बोलचाल की सरल भाषा होती थी।

भारतीय तटरक्षक सेना ने 2006 को एक जहाज को उनका नाम दिया, 16 अगस्त, 1976 को उन पर 25 पैसे का डाक टिकट भी जारी किया गया है।

उनकी अन्य प्रसिद्ध कविताओं में वीरों का कैसा हो बसंत, राखी की चुनौती और विदा शामिल हैं, ये कवितायेँ भी हमारी आज़ादी के आंदोलन का स्पष्ट रूप से बखान करती हैं,इन सभी कविताओं में आज़ादी के आंदोलन के बारे में स्पष्ट रूप से बताया गया है।

सन् 1904 में इलाहाबाद के निहालपुर ग्राम में जन्मी सुभद्राकुमारी चौहान की कविताओं में राष्ट्रचेतना और ओज कूट-कूट कर भरा है।

बचपन से ही आपके मन में देशभक्ति की भावना इतने गहरे तक पैठ बनाए हुए थी कि सन् 1921 में अपनी पढ़ाई छोड़ आपने असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।

उनकी शिक्षा भी इलाहाबाद से ही हुई थी, खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ विवाह के बाद वे जबलपुर आ गई थीं।

1920 - 21 में सुभद्रा और लक्ष्मण सिंह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे, उन्होंने नागपुर कांग्रेस में भाग लिया और घर-घर में कांग्रेस का संदेश पहुँचाया।

सुभद्रा कुमारी चौहान की ओजस्वी और राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कविताएं आज भी लोगों में जोश पैदा करती हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं में वीर रस की प्रधानता रही है, जिस समय इन्‍होंने लिखना शुरू किया राजनैतिक दृष्टि से उथल पुथल का युग था।

हिंदी काव्य जगत में ये अकेली ऐसी कवयित्री हैं जिन्होंने अपने कंठ की पुकार से लाखों भारतीय युवक-युवतियों को युग-युग की अकर्मण्य उपासी को त्याग, स्वतंत्रता संग्राम में अपने को समर्पित कर देने के लिए प्रेरित किया।

यह कवयित्री सन् 1948 में एक सड़क दुर्घटना में हमसे बिछड़ गई।

                                    वीर रस की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रमुख कविता -

Subhadra Kumari Chauhan Poems {1}

झाँसी की रानी:-

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी।

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी, लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी।

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।

वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी।

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।

जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम, नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम।

अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम, भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।

लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में।

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।

ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार।

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी, अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी।

काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी, युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।

पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार, किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार।

घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार, रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी।

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी।

दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।


जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,

होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

Subhadra Kumari Chauhan Poems {2}


“झाँसी की रानी की समाधि पर”

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |

जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||

यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |

अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |

उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |

सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |

आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |

मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||

रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |

यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |

उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||

पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |

स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |

खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||

यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |

अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

सुभद्रा कुमारी चौहान की कुछ अन्य प्रतिनिधि रचनाएँ

अनोखा दान ।

आराधना ।

इसका रोना ।

उपेक्षा ।

उल्लास ।

कलह-कारण ।

कोयल ।

खिलौनेवाला ।

चलते समय ।

चिंता ।

जलियाँवाला बाग में बसंत ।

जीवन-फूल ।

झिलमिल तारे ।

ठुकरा दो या प्यार करो ।

तुम ।

नीम ।

परिचय ।

पानी और धूप ।

पूछो ।

प्रथम दर्शन ।

प्रतीक्षा ।

प्रभु तुम मेरे मन की जानो ।

प्रियतम से ।

फूल के प्रति ।

बालिका का परिचय ।

बिदाई ।

भ्रम ।

मधुमय प्याली ।

मुरझाया फूल ।

मातृ-मन्दिर में ।

मेरा गीत ।

मेरा जीवन ।

मेरा नया बचपन ।

मेरी टेक ।

मेरे पथिक ।

यह कदम्ब का पेड़ ।

राखी ।

राखी की चुनौती ।

विजयी मयूर ।

विदा ।

वीरों का कैसा हो वसंत ।

वेदना ।

व्याकुल चाह ।

सभा का खेल ।

समर्पण ।

साध ।

स्मृतियाँ ।

स्वदेश के प्रति ।

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