इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, जाने कैसे करें सही उपयोग


इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, जाने कैसे करें सही उपयोग

आवश्यकता आविष्कार की जननी है | यह तोह सबने सुना ही है| यदि आप को किसी चीज़ की ज़रुरत ही महसूस नहीं होती तो आविष्कार होना संभव ही नहीं था |
इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, जाने कैसे करें सही उपयोग

देखा जाए तो आज हम दुनिया के किसी भी कोने से कोई भी वस्तु प्राप्त कर सकते हैं बशर्ते हमारे पास पर्याप्त धन होना चाहिए। बीत गए वो दिन जब लोगोँ का जीवन स्थानीय वस्तुओं पर निर्भर रहता था।

जीवन को सुखी और सुरक्षित बनाने के लिए एक से बढ़कर एक आविष्कार हो रहे हैं। जिससे मानव समाज को बहुत लाभ हो रहा है|

टेक्नोलॉजी ने हमारे जीवन को बहुत सरल बना दिया है। आज की 21वीं शताब्दी में हम टेक्नोलॉजी की जिन्दगी में जी रहे है। आज तकनीक के बिना जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। परिवहन के लिए हम कार, बस, मोटरसाइकिल, प्लेन, ट्रेन का इस्तेमाल करते है।

प्रकृति का एक ख़ास नियम है कि जिस चीज से हमें जितने ज्यादा फायदे होते हैं यदि उन्हें उचित रूप से उपयोग नहीं करेंगे तो उनके उतने ही ज्यादा नुकसान भी होते हैं।



हम अपने सभी कार्यों के लिए टेक्नोलॉजी पर निर्भर हैं। लोग कारों, कंप्यूटर, स्मार्टफोन आदि जैसे आधुनिक उपहारों की आधुनिकता के प्रति अधिक निर्भर हैं। तकनीकी प्रगति ने भोग विलास तथा मौज मस्ती को सरलता से प्राप्य बना दिया है।

अपने मित्रो, परिवार से बात करने के लिए फोन का इस्तेमाल करते है, मनोंरजन के लिए अब LED टीवी हमारे पास है। रसोई में खाना ओवन, मिक्सर ग्राइंडर, इन्डकशन चूल्हा जैसे इलेक्ट्रानिक उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे है। घर की सजावट के लिए आज अनेक तरह की आधुनिक तरह की लाईट्स का इस्तेमाल होता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, जाने कैसे करें सही उपयोग


गर्मी-सर्दी के मौसम में एयर कंडीनीशनर का इस्तेमाल बहुत प्रचलित हो गया है। लगभग सभी बड़े शहरो के घरो में एयर कंडीनीशनर होता है।

अब हमको बिजली, टीवी, पंखा, एयर कंडीनीशनर, स्मार्ट फोन, कम्प्यूटर जैसे आधुनिक चीजो की आदत हो गयी है जिनके बिना हम जीना ही नहीं चाहते।

अब जिओ, वोडाफोन, आइडिया जैसे कम्पनी कम शुल्क में अच्छी और फ्री कालिंग और विडियो कालिंग जैसी सुविधा दे रही है। अब हम अपने मित्रो, प्रियजनों से असीमित मात्रा में बात कर सकते है।

पहले ये संभव नही था क्यूंकि फोन सेवायें बहुत अधिक महंगी थी। अब हम विडियो फ्री में अपने फोन या कप्यूटर में देख सकते है।

अब हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से कालिंग या विडियो कालिंग करके बात कर सकते है।
ओवन, मिक्सर ग्राइंडर, रेफ्रीजरेटर, इन्डकशन चूल्हा जैसे उपकरणों ने रसोई का काम आसान कर दिया है।

आज की गृहिणी वाशिंग मशीन से कपड़े धोती है। इस तरह उसकी मेहनत और समय दोनों की बचत होती है।
अब LED तकनीक वाले बल्ब बाजार में है जो बहुत कम बिजली लेकर अधिक रोशनी देते है।

इस तरह बिजली की बचत होती है और देश के गाँव गाँव में बिजली जा रही है। लोगो के बिजली के खर्च में बचत हुई है। सौर ऊर्जा तकनीक का इस्तेमाल हर गाँव और शहर के लोग कर रहे है। सौर ऊर्जा तकनीक बेहद सस्ती और किफायती है।

अब देश में अधिकतर महिलायें गैस पर खाना पकाने लगी है। इससे उनको धुआ नही लगता है, उनके स्वास्थय में सुधार हुआ है। आधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से गैस के नये भंडारों की खोज हुई है।



गोबर और कचरे से भी रसोई गैस बनाने की तकनीक बनाई जा रही है। CNG गैस का इस्तेमाल आजकल हर मेट्रो सिटी में बस, ऑटो और अन्य वाहनों में हो रहा है। इससे वायु प्रदुषण कम हुआ है।

आजकल डेंगू, मलेरिया, खसरा, चिकनगुनिया, जापानी इन्सेफेलाइटिस, कैसर, यौन रोग, टीवी, अस्थमा, प्रसवपूर्व और प्रसवबाद के होने वाले रोग, हेपेटाईटिस, शुगर जैसे असाध्य रोगों का इलाज ढूढ़ लिया गया है।

आधुनिक चिकित्साशास्त्र में रोज नये नये शोध और खोजे हो रही है। इससे हमे बहुत लाभ हुआ है। चिकित्सा की नई टेक्नोलॉजी आ जाने से भारत में मृत्यु दर में गिरावट आई है।

इस तरह से हम कह सकते है की आज विज्ञान की मदद से टेक्नोलॉजी बहुत आगे निकल गयी है। तकनीक के ज्यादा उपयोग ने हर काम को जितना आसान बनाया है, उतना ही लोगों को आलसी भी बना दिया है |

हमारे द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले सबसे प्रचलित टेक्नोलॉजी उपकरण और सेवायें जैसेकि :-

COMMON ELECTRONIC GOODS USED BY US
  1. घरेलू उपकरण- पंखा, एयर कंडीनीशनर, इलेक्ट्रिक पानी मोटर, इनवर्टर, जेनरेटर, बिजली सप्लाई, अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरण
  2. शिक्षा और घरेलू काम के लिए – कम्प्यूटर, इंटरनेट, प्रिंटर, कैमरा, प्रेस
  3. संचार के लिए – इंटरनेट सेवा
  4. मनोरंजन के लिए- टेलीविजन, सिनेमा
  5. कपड़े धोने और सुखाने के लिए- वाशिंग मशीन
  6. परिवहन के लिए- मोटर साईकिल, कार, स्कूटी, ट्रेन, हवाईजहाज, बुलेट ट्रेन
  7. संचार/ बात करने के लिए- फोन, टेलीफोन, स्मार्ट फोन, टैबलेट
  8. रसोईघर के लिए – ओवन, मिक्सर ग्राइंडर, रेफ्रीजरेटर, इन्डकशन चूल्हा
  9. स्वास्थ्य लाभ के लिए – दवाये और आधुनिक चिकित्सा तकनीक और सेवायें
उदहारण के रूप मे कुछ उपकरणों के फ़ायेदे तथा नुकसान

1. इलेक्ट्रिक आयरन (Electric Iron)
आयरन का इस्तेमाल सभी लोग अपने कपडो को प्रेस (press) करने के लिए जरूर करते है| इसके इस्तेमाल से आपके कपड़े काफ़ी हद तक नए जैसे हो जाते है, जिन्हें पहनने के बाद आपकी पर्सनालिटी में भी निखार आता हैं।

यदि इस तरह से देखा जाए तो आयरन के इस्तेमाल के फायदे-ही-फायदे हैं। हालांकि इसके नुकसानों के बारे मे कोई सीधे सीधे बात नहीं करता परन्तु इसके नुक्सान भी है।

ये बात अलग है कि इनमें से ज्यादातर नुकसान हमारे ही गलतियों और लापरवाहियों की वजह से होते हैं, जबकि टेक्निकल फ़ॉल्ट की वजह से बहुत ही कम होते हैं।

यदि कोई काम करते समय हमारा ध्यान जरा-सा भी भटक जाए तो इससे हमें भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। ठीक यही बात कपड़े को आयरन करने के समय भी होता है।

उस समय यदि हमारा ध्यान जरा सा भी भटक जाए तो कपड़े के जलने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसलिए जब भी कभी किसी कपड़े को आयरन करें तो अपना पूरा ध्यान इसी काम पर रखें।

इतना ही नहीं, यदि आपके घर की बिजली में कम वोल्टेज रहता हो तो ठीक है लेकिन यदि पूरा वोल्टेज रहता हो तो भूलकर भी नॉन आटोमेटिक या मैन्युअल आयरन का इस्तेमाल न करें।

यदि आप इस आयरन का इस्तेमाल करेंगे तो आपके कपड़े ज्यादा जलेंगे क्योंकि ज्यादा वोल्टेज रहने की वजह से जब ये आयरन ज्यादा गर्म हो जायेगा तो कपड़े तो जलेंगे ही।
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इसलिए यदि आपके घर की बिजली में ज्यादा वोल्टेज रहता हो तो आपको सदेव आटोमेटिक आयरन का ही इस्तेमाल करना चाहिए।

कभी - कभी टेक्निकल खराबियों की वजह से भी आयरन हद से ज्यादा गरम हो जाती हैं जिस वजह से बिना हमारे गलती के भी हमारे कपड़े जल सकते हैं।

2. इलेक्ट्रॉनिक हीटर (Electric Heater)
इलेक्ट्रॉनिक हीटर - सर्दियों में अक्सर हम सभी अपने घरों में ठंड से बचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक हीटर का इस्तेमाल करते हैं। एक ओर जहां इलेक्ट्रॉनिक हीटर की गर्माहट तेज ठंड से आपको बचा सकता है वहीं दूसरी ओर इसको इस्तेमाल करने से आपको कुछ परेशानियां भी हो सकती हैं।

इलेक्ट्रॉनिक हीटर आपके कमरे की हवा को गर्म तो बना देता है पर कमरे की सारी नमी भी चुरा लेता है। इलेक्ट्रॉनिक हीटर न सिर्फ कमरे की हवा को शुष्क कर देता है बल्कि आंखों की नमी भी छीन लेता है।

जिससे ड्राई आई की समस्या भी हो सकती है। हवा में नमी होना आपकी त्वचा के लिए भी अच्छा है पर जब यह नमी हीटर द्वारा चुरा ली जाती है तो इसका असर आपकी त्वचा पर भी पड़ता है।



स्किन ड्राई होने लगती है जिससे जल्दी रैशेज पड़ने लगते हैं। शुष्क हवा में सांस लेने से श्वास संबंधी समस्याएं भी जन्म ले सकती हैं। अस्थमा के मरीजों के लिए यह और भी समस्याएं पैदा कर सकता है। नाक की झिल्ली सूखकर खून निकलने की समस्या भी हो सकती है।

3. “इंटरनेट” कम्प्यूटर और स्मार्टफोन
आजकल इंटरनेट का जमाना है अब तो घर बैठे ट्रेन, प्लेन, बस का टिकट खरीद सकते है। इसके अलावा अब हज़ारों लाखों ऐप है जिनसे अलग अलग तरह की जानकारीया जानकारीया पाई जा सकती है|

अब विद्दार्थी विभिन्न प्रकार के कोर्स ऑनलाइन ही कर सकते है। इस तरह घर बैठे शिक्षा पाना संभव हुआ है। आज अनेक वेबसाइट, यूट्यूब पर लोग पढ़ाने का काम करते है।

विद्यार्थी घर बैठे विडियो देखकर पढ़ाई कर सकते है। अब महंगी फीस देकर ट्यूशन, कोचिंग पढने की जरूरत नही है।

वही टेक्नोलॉजी के दूसरे पहलु को देखा जाए तो आजकल हर बच्चा हिंसा, मारधाड़, खून- खराबे वाले विडियो गेम खेल रहा है। ब्लू व्हेल, मोमो, पोकेमॉन गो जैसे गेम खेलकर कितने बच्चे आत्महत्या कर चुके है।

“ब्लू व्हेल” नाम का खेल खेलकर दुनियाभर में 250 बच्चे अपनी जान दे चुके है।

आज छोटे स्कूली बच्चो को भी स्मार्ट फोन, और इंटरनेट की लत लग गयी है। कम्प्यूटर, फोन का इस्तेमाल बच्चे अश्लील फिल्म, अश्लील साहित्य पढ़ने के लिए करने लगे है। आजकल बच्चे अपनी पढ़ाई पर ध्यान नही दे रहे है।

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वो सारा दिन फोन या कम्प्यूटर पर ही चिपके रहते है। बच्चे घर के कामो और जिम्मेदारीयों से बचने लगे है। सोशल मीडिया पर अपना सारा समय नष्ट कर देते है। फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्सअप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर बच्चे जादा वक्त चैटिंग और विडियो देखने में बिताते है। इस तरह उनकी पढ़ाई का नुकसान हो रहा है।

अपने कीमती समय का इस्तेमाल अगर बच्चे पढ़ाई में करे तो उनको बहुत फायदा होगा। उनका भविष्य उज्ज्वल बनेगा। कई बार तो लगता है की काश हम टेक्नोलॉजी में इतना अधिक विकास ही नही करते तो अच्छा होता। इसलिए सभी बच्चो को सिर्फ शिक्षा और पढ़ाई के लिए फोन और कम्प्यूटर का इस्तेमाल करना चाहिये।

पहले बच्चें घर से निकलने और खेलने का बहाना खोजते थे | किसी तरह मौका मिला नहीं कि मैदान की तरफ भागे| छुट्टियों के दिन मैदानों पर पैर रखने को जगह नहीं मिला करती थी |

बच्चों का हुजूम नजर आता था| मैदान में भी बच्चें अपने खेलने की जगह बाँट लेते थे कि किसकी टीम कहाँ खेलेगी| यदि कोई और उस जगह पर खेलने आ जाए तो घमासान मच जाता था| साथ में खेलने से बच्चों में मित्रता कि भावना बढ़ती| आपस में भाईचारा बढ़ता| आज हालत बिलकुल उलटा है।

बच्चों के लिए खेल का मतलब हो गया है कंप्यूटर गेमिंग| पूरा दिन निकल जाता है कंप्यूटर पर खेलते हुए।

आजकल अनेक कम्पनियां सस्ते फोन बना कर बेच रही है। आये दिन किसी न किसी ग्राहक का फोन पर बात करते समय फ़ोन फट जाता है और वो गंभीर रूप से घायल हो जाता है। इसके अलावा सीमा से अधिक मात्रा में फोन को अपने पास रखने से रेडिएशन से घातक बीमारियाँ हो रही है।

एक चैरिटी संस्था व्हाट अबाउट द चिल्ड्रेन (वॉच) का कहना है कि आधुनिक लाइफ़ स्टाइल से बच्चों के दिमाग़ पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इनका कहना है कि बच्चों को कुर्सियों पर बैठाना और स्ट्रैप लगा देना या फिर स्मार्टफोन और टैबलेट देना खेलने के लिए, ये सब बच्चों के लिए घातक साबित हो रहे हैं।

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संस्था के अनुसार इन सबका बाद में बच्चों के जीवन पर बुरा असर पड़ता है। चैरिटी का कहना है कि अभिभावकों को कम उम्र के बच्चों के साथ ख़ुद रहना चाहिए ताकि वो बेहतर महसूस करें और इसी से उनके दिमाग़ का अच्छा विकास होता है।

न्यूरो-फिज़ियोलॉजिकल साइकोलॉजी संस्थान के निदेशक सैली गोडार्ड ब्लिथ का कहना है की सामाजिक बातचीत से शारीरिक विकास पर असर पड़ता है, आंखों से जब आप बच्चों से बात करते हैं, गाते हैं, नाचते हैं तो उसका असर होता है।

ये सब कम हो रहा है क्योंकि बच्चों को अब उनके चेयरों में बांध कर रखा जा रहा है और माएं स्मार्टफोन पर बतिया रही हैं।

सैली गोडार्ड ब्लिथ के अनुसार नवजात बच्चों को चलने फिरने और नई चीज़ों को जानने का मौका चाहिए होता है ताकि उनका समग्र विकास हो सके. बच्चों में संतुलन, समन्वय और ध्यान जैसी अवधारणां शुरुआती 36 महीनों में ही विकसित होती हैं।

4. सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल
आजकल मनचले लड़के लड़कियों के साथ छेड़छाड़, बलात्कार, दुष्कर्म करते है, और फोन से विडियो बना लेते है। बाद में इस विडियो के द्वारा लड़कियों को ब्लैकमेल करके दुबारा से मनमानी करते है।

जब लड़कियाँ मना करती है तो सोशल मीडिया पर ऐसे विडियो को वाइरल करने की धमकी देते है। इस तरह से आज असामाजिक तत्व टेक्नोलॉजी का गलत फायदा उठाने लगे है।



कई बार जब दुष्कर्म के विडियो फेसबुक, व्हाट्सअप पर वाइरल हो जाता है तो लड़कियाँ शर्म और बेइज्जती के कारण आत्महत्या तक कर लेती है। देश में अनेक लड़कियाँ ऐसा कर चुकी है।

5. बैंक अकाउंट मे हेरा फेरी
आये दिन ऐसी खबरे आती रहती है जिनमे हैकर्स हमारे इंटरनेट बैंक अकाउंट के खाते को हैक करके पैसो की चोरी करते है।

कुछ चोर ATM कार्ड बदलकर, क्लोन बनाकर हमारे पैसे चुरा लेते है तो कही लुटेरे और चोर हमे फर्जी काल करके परेशान करते है। हमारा बैंक अकाउंट नम्बर, पासवर्ड, OTP नम्बर पूछते है। इस तरह टेक्नोलॉजी ने हमारी समस्याएँ भी बढ़ा दी है।

जब किसी चीज़ का आविष्कार होता है तो उसके नुकसान और फायदे दोनों ही देखने में आते हैं। हमे टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सोच समझकर मानव कल्याण के लिए करना चाहिये। हमे टेक्नोलॉजी पर हर बात के लिए निर्भर नही होना चाहिए और न ही इसकी आदत डाल लेनी चाहिए।
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अब आवश्यक है की टेक्नोलॉजी से उत्पन होने वाले संकटो को हल करने के तरीकों की खोज की जाए| जिसमे टेक्नोलॉजी के कारण उत्पन होने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे को रीसाइक्लिंग करना एक महत्वपूर्ण स्टेप है|

इलेक्ट्रॉनिक कचरे अर्थात ई-कचरे के कारण ही आज वायु प्रदूषण का स्तर पिछले 10 साल में तीन गुना बढ़ गया है। जिसके कम होने की सम्भावना फिलहाल नजर नहीं आ रही है।

औद्योगिक इकाइयों के अलावा पूरी दुनिया के इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर से जो कचरा निकल रहा है, वह भी विश्व पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है।

जबकि लगभग सभी देश इस कचरे के अधिक-से-अधिक हिस्से की रीसाइक्लिंग कर रहे हैं और सभी बेकार की चीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। बावजूद इसके करोड़ों टन ई-कचरा बाहर आ रहा है और विश्व पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है।

सरकार ई-कचरे के डिस्पोजल के मसले को जब तक गम्भीरता से नहीं लेगी और ई-कचरा कलेक्शन सेंटर नहीं खोले जाएँगे, तब तक कोई बात बनने वाली नहीं है। ई-कचरा डिस्पोजल के लिये उत्पादक कम्पनी को जवाबदेह बनाना होगा |

विशेषज्ञों का मानना है कि ई-कचरे के बढ़ने का कारण हमारी तेजी से बदलती जीवनशैली है। केवल भारत में ही इलेक्ट्रॉनिक कचरा प्रतिवर्ष दस फीसदी की दर से बढ़ रहा है।

ई-कचरे के प्रदूषण से गुर्दे, यकृत और हृदय रोग से पीड़ित मरीजों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बनाने के दौरान बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक कचरा फैक्टरियों से निकलता है, जो सही और उचित डिस्पोजल व्यवस्था न होने के कारण महीनों फैक्टरियों में ही पड़ा रहता है और कर्मचारियों की सेहत को नुकसान पहुँचता है।

भारत में ई-कचरे को डम्प करके इसे नष्ट करने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। जबकि विदेशों में ई-कचरे के डिस्पोजल के लिये वैज्ञानिक व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।

विदेशों में कोई ई-कचरा चाहे जहाँ नहीं फेंक सकता और न समुद्र में डाल सकता है। ऐसा करने पर कड़ी सजा का प्रावधान भी है। इसलिये वहाँ लोग खराब टीवी उस कम्पनी को दे देते हैं, जो ई-कचरे को डिस्पोज करती है।



भारत में लगभग सभी शहरों में वोल्टेज प्रॉब्लम रहती है, इसीलिये अपने यहाँ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जल्दी खराब हो जाते हैं इन्हें फिर करवा लिया जाता हैं जिससे यह और खतरनाक होते जाते हैं।

एक उपकरण बहुत तेजी से बासी हो जाता है और उसकी जगह कोई दूसरा उपकरण ले लेता है। पुराना उपकरण कुछ दिनों तक घर में या फैक्टरी में यों ही पड़ा रहता है, उसके बाद उसके डिस्पोजल की समस्या आ जाती है।

टीवी, मोबाइल, कैमरे व उसके लेंस-बैटरीज, लैपटॉप, वॉशिंग मशीन, एयर कंडिशनर और कम्प्यूटर आदि ऐसे उपकरण हैं, जिनका ई-कचरा सबसे ज्यादा निकलता है जो पर्यावरण के लिये अत्याधिक हानिकारक है।

भारत सरकार ने सन 2011 में ई-कचरे के बढ़ते खतरे को देखते हुए ई-कचरे के मैनेजमेंट और हैंडलिंग के लिये नियम बनाए थे और उन्हें लागू भी किया, लेकिन नियमों के पालन में सख्ती न बरते जाने के कारण किसी ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया। नतीजतन ई-कचरा यहाँ वहां फेंका जा रहा है।

विदेशों की तुलना में भारत अभी सामान्य कचरा प्रबन्धन के मामले में बहुत पीछे है। जबकि ई-कचरे के साथ कैसे निबटना है इसकी चिन्ता किसी को नहीं है|

राज्यसभा के आदेश पर ई-कचरे के मैनेजमेंट और हैंडलिंग के मुद्दे पर कई शोध करवाए गए। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2005 में देश में प्रतिदिन 1.47 लाख टन ई-कचरा निकलता था, जबकि 2013 में 850 हजार टन ई-कचरा निकला परन्तु दुखद यह है कि इस ई-कचरे का केवल पाँच फीसदी का ही आज निस्तारण हो पा रहा है।

आँकड़े बताते हैं कि भारत सरकार हर साल 60 लाख टन ई-कचरा आयात करती है। कई बार जो इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद आयात किये जाते है  वे बाद में कूड़ा साबित होते है।

नतीजा यह निकलता है कि इस कचरे को ठिकाने लगाने में ही हमें एक बहुत बड़ी मात्रा मे खर्च करना पड़ता है। पिछले 15 वर्षों से हमारे देश में चाइनीज इलेक्ट्रॉनिक उत्पादो की माँग बढ़ गई है।

अरबों रुपए के प्रोडक्ट्स आयात किए जाते है। एक अनुमान के अनुसार, करोड़ों रुपए के केवल इलेक्ट्रॉनिक खिलौने ही आयात हो रहे हैं। डिजिटलीकरण के दौरान कई अरब रुपए के चाइनीज मेक सेट टॉप बॉक्स मँगाए गए थे, जो 6 महीने भी नहीं चले।

चाइनीज प्रोडक्टस के बारे में प्रचलित है कि उनकी न तो आयु होती है और न ही गुणवत्ता। वन टाइम यूज के लिये बनाए गए ये प्रोडक्ट कुछ ही दिनों में खराब हो जाते हैं जिसके बाद यह ई-कचरा देश में जमा होता रहता है।

इनकी रीसाइक्लिंग पर पैसा खर्च करने पर कुछ ख़ास नहीं मिलता। तब यह ई-कचरा हमारे लिए एक बोझ बन जाता है और पर्यावरण को सीधे-सीधे या परोक्ष रूप से नुकसान पहुँचाता है।

इस कचरे को नदी व समुद्र में भी नहीं बहा सकते हैं और न ही जमीन में गाड़ सकते हैं इन्हें  जला भी नहीं सकते, क्योंकि इसके जलने पर जहरीली गैस निकलती है, जिससे वायु प्रदूषण होता है। इस तरह हर साल करोड़ों टन ई-कचरा जमीन पर पड़ा रहता है और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता रहता है।

अगर 14 इंच के किसी टीवी के स्क्रीन ट्यूब को रिसाइकिल किया जाये तो करीब दो किलोग्राम सीसा मिलता है। इसके अलावा ई-कचरे से रिसाइक्लिंग के बाद आर्सेनिक, बेरियम, कोबाल्ट, निकेल, क्रोमियम, कैडमियम, जस्ता जैसे जहरीले पदार्थ निकलते हैं, जो अगर जमीन के भीतर या बाहर यों ही छोड़ दिये जाएँ तो पर्यावरण और जीवन को इतना नुकसान पहुँचा सकते हैं कि जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

इतने जहरीले ई-कचरे को ठिकाने लगाने की भी हमारे देश में कोई सुनिश्चित वैज्ञानिक व्यवस्था नहीं है।

ई-कचरा इधर-उधर या नदियों किनारे डम्प किया जाता है या चोरी-छिपे नदियों में फेंक दिया जाता है। शहर के बाहर ई-कचरे को सामान्य कचरे के साथ डम्प किये जाने के कारण कोबाल्ट-60 के विकिरण के कारण दिल्ली के एक औद्योगिक क्षेत्र में कुछ लोगों की मौत हो गई थी।

कूड़ा बीनकर जीविकोपार्जन करने वाले लोग ई-कचरे के खतरे से परिचित नहीं हैं। इनके लिये ई-कचरे की कीमत प्लास्टिक और टूटी चप्पल से अधिक नहीं है, जबकि खतरे कई हजार गुना ज्यादा हैं।



ई-कचरे के कारण ही आज वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। जिसके कम होने की सम्भावना फिलहाल अभी तो नजर नहीं आ रही।

यूरोप में जब यह खतरा बढ़ने लगा, तब वहाँ की सरकार ने एक कानून बनाया कि ई-कचरा हर हाल में उत्पादक कम्पनी को वापस लेना होगा और उसके एवज में ग्राहक को उचित मूल्य मिलेगा| सरकार ने ई-कचरे के डिस्पोजल की जिम्मेदारी उत्पादक पर डाल दी।

भारत में भी इस तरह का कानून है, लेकिन इसकी जानकारी न उत्पादक के पास है, न ग्राहक के पास। जानकारी के अभाव में ये तय कर पाना मुश्किल होता है कि ई-कचरे का डिस्पोजल किसे करना है। इससे सम्बन्धित जानकारी कम्पनी के कस्टमर केयर के पास भी नहीं होती।

फिलहाल कुछ कम्पनियाँ बैटरी, मोबाइल और कम्प्यूटर आदि वापस लेने लगी है|

सरकार ई-कचरे के डिस्पोजल के मसले को जब तक गम्भीरता से नहीं लेगी और ई-कचरा कलेक्शन सेंटर नहीं खोले जाएँगे, तब तक कोई बात बनने वाली नहीं है।

ई-कचरा डिस्पोजल के लिये उत्पादक कम्पनी को जवाबदेह बनाना होगा। उत्पादक कम्पनियों को बेकार हो गए उपकरणों को वापस लेना होगा और 180 दिन के भीतर उसे रिसाइकिल करना होगा।

जानकारी है कि ई-कचरे के बढ़ते संकट को देखते हुए झारखण्ड के जमशेदपुर स्थित राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला के धातु निष्कर्षण विभाग ने ई-कचरे में छुपे सोने को खोजने की एक सस्ती तकनीक खोज निकाली है।

जिसके माध्यम से एक टन ई-कचरे से 350 ग्राम सोना निकाला जा सकता है।जानकारी के मुताबिक मोबाइल फोन पीसीबी बोर्ड के दूसरी तरफ कीबोर्ड के पास सोना लगा होता है। साइनाइड थायोयूरिया जैसे रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल कर यह सोना निकाला जाता है।

तो कह सकते है की ई-कचरा सिर्फ कचरा नहीं है। सोने की खान भी है।
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