गांधीवादी दृष्टि को नई शिक्षा नीति में शामिल किया जाना चाहिए




हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार जयशंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य 'कामायनीÓ में लिखा है, 'ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों पूरी हो मन की, एक दूसरे से न मिल सके, यह विडंबना है जीवन की।Ó यहां ज्ञान का अर्थ है पुस्तकीय शिक्षा, ज्ञान और क्रिया का अर्थ है वास्तविक जीवन से जुड़े हुए क्रियाकलाप जो हमारे जीवन-समाज को प्रभावित करते हैं। अफसोस की बात है कि मैकाले के प्रभाव में बनी हमारी शिक्षा पद्धति में इस पुस्तकीय शिक्षा और वास्तविक जीवन से जुड़े हुए क्रियाकलापों में एक बड़ा अंतराल है, जो देश की चतुर्दिक प्रगति में बाधक रहा है। इस मैकाले मानस के सबसे बड़े पैरोकार अंग्रेजीपरस्त बुद्धिजीवी और मीडिया रहे हैं। इसी मानसिकता का नया चेहरा है एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार द्वारा मानव संसाधन विकास मंत्रालय यानी एमएचआरडी के एक हालिया निर्देश की आलोचना जिसमें सामाजिक परिवर्तन की योजनाओं से उच्च शिक्षा संस्थानों को जोडऩे की बात की गई है। खिल्ली और निंदा जैसे भावों के साथ उसका तो यह अंदाज था कि इन गैर-शैक्षणिक चीजों का शैक्षणिक संस्थानों में क्या काम। इस बीच एक अहम सवाल यह भी उठता है कि क्या मंत्रालय के सामाजिक-सांस्कृतिक निर्देश शैक्षणिक-आर्थिक चीजों से नहीं जुड़े हैं मोदी सरकार पहले कार्यकाल से ही देश के विकास के नए आख्यान लिख रही है। शिक्षा-संस्कृति के मोर्चे पर भी यह परिवर्तन दिखाई पड़ता है। इसी कड़ी में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पहल करते हुए निर्देश दिया है कि राष्ट्रनिर्माण के लिए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की विभिन्न योजनाओं में विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। स्वच्छता अभियान को ही देखें तो यूनिसेफ ने एक अध्ययन में बताया कि खुले में शौच से मुक्त यानी ओडीएफ गांव सालाना 50,000 रुपये की बचत करेगा, क्योंकि बीमारियों का प्रकोप थमेगा। इससे स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बचेगा। यदि भारत के छह लाख गांवों द्वारा इस बचत का आकलन किया जाए तो यह राशि 300 करोड़ रुपये से अधिक होगी। गेट्स फाउंडेशन और विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के अलग-अलग अध्ययनों में दिखाया गया है कि एक गैर-ओडीएफ जिले की तुलना में ओडीएफ जिले में डायरिया, स्टंटिंग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में गिरावट आती है। स्वच्छता का एक और भी आर्थिक पक्ष है कि यह पर्यटन और रोजगार को बढ़ावा देता है। इसी तरह असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए पेंशन योजना की जागरूकता से एक बड़े गरीब वर्ग की आर्थिक दशा में सुधार होगा। यही नहीं, 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत अभियानÓ के तहत अपनी मातृभाषा से इतर दूसरे राज्य की भाषा का ज्ञान और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी की योजना भी बहुत सुविचारित है। इस योजना में प्रत्येक छात्र को अपने राज्य से बाहर की एक भाषा सीखनी होगी। उन्हें 100 वाक्य, पांच गाने और 10 मुहावरे ऑनलाइन सीखने होंगे। भाषा व संस्कृति का शिक्षक-शोधकर्ता होने के नाते मैं यह बात दावे से कह सकता हूं कि महात्मा गांधी के सपनों पर आधारित यह योजना अव्यावहारिक नहीं और इसे अमल में लाना संभव है। यह भाषाई ज्ञान भारत जैसे बहुभाषी देश में सौहार्द एवं सौमनस्य को बढ़ावा देकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगा तो दूसरी ओर आर्थिक रूप से भी लाभदायक साबित होगा। इससे देश के विभिन्न हिस्सों में गाहे-बगाहे होने वाले भाषाई तनाव और संघर्ष से उपजने वाले बंद, हड़ताल और तोडफ़ोड़ के कारण आर्थिक नुकसानों से निजात तो मिलेगी ही। साथ ही व्यापार-रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। इसी तरह विभिन्न राज्यों के छात्रों को दूसरे राज्य में जाकर कम से कम एक सप्ताह बिताने की योजना है, ताकि देश की विविधतायुक्त सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों का ज्ञान युवाओं को हो सके और वे राष्ट्रीय भाव से ओतप्रोत एक जिम्मेदार नागरिक बनें। प्राचीन भारतीय परंपरा में भी ज्ञान-शिक्षा की पूर्णता के लिए राजकुमारों तक को विद्या-अध्ययन के बाद साधारण व्यक्ति की तरह देशाटन पर जाना पड़ता था। इससे कोरे सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ वे समाज-संस्कृति व अर्थव्यवस्था का व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल कर पाते जो व्यक्ति व समाज दोनों के लिए लाभकारी होता था। इसके उलट मैकाले मानसिकता से संचालित हमारे उच्चतर पाठ्यक्रमों में व्यावहारिक ज्ञान और सामाजिक क्रियाकलाप की लगभग अनदेखी कर दी गई। बहरहाल एमएचआरडी की उपरोक्त योजना में कई कमियां भी हैं। एक तो यही कि समूची योजना का कोई उचित रूप-स्वरूप नहीं। सारे कार्यक्रमों में सभी विद्यार्थियों की एक साथ भागीदारी से कई दिक्कतें होंगी। ऐसे में जरूरी है कि इस संदर्भ में संस्थानों के लिए साल भर का एक कैलेंडर और कार्ययोजना का दिशानिर्देश हो। हर महीने व प्रत्येक कार्यक्रम के हिसाब से छात्रों के अलग-अलग समूह बनाए जाएं। यह भी आवश्यक है कि एक जिले के विभिन्न संस्थानों में आपसी समन्वय हो ताकि संसाधनों का अपव्यय एवं समयावधि में टकराव न हो और अपेक्षित परिणाम हासिल हो सकें। इसके अतिरिक्त एमएचआरडी द्वारा निर्दिष्ट उपरोक्त कार्यक्रमों के अलावा छात्रों की योग्यता एवं अभिरुचि के आधार पर दूसरी अनेक योजनाओं को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। कृषि आदि के छात्रों को किसानों की पैदावार बढ़ाने और अन्य समस्याओं से जोड़ा जा सकता है तो मेडिकल के छात्रों को गांव या गरीब बस्तियों में स्वास्थ्य सुधार से संबंधित कार्यक्रमों में। इसे अनिवार्य करते हुए इसमें तीन से पांच प्रतिशत अंक निर्धारित कर देने चाहिए।


वास्तव में ज्ञान को जीवनकर्म से जोडऩे की गांधीवादी दृष्टि वाले इन सुझावों को प्रस्तावित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया जाए, इसी में शिक्षा, समाज और राष्ट्र, सबकी भलाई है।

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