लंबी ड्राइविंग से स्पाइनल कॉर्ड में स्लिप डिस्क का खतरा

इलाज में लापरवाही से लकवे का कारण बन सकता है स्लिप डिस्क


जयपुर। हमारे स्पाइनल कॉर्ड में होने वाला तेज दर्द लकवे जैसी गंभीर समस्या का कारण भी बन सकता है। लंबी ड्राइविंग या लंबे समय तक एक जगह पर बैठे रहने से स्पाइनल कॉर्ड में स्लीप डिस्क होता है। खासतौर पर युवाओं में यह बीमारी तेेेजी से फैल रही है। स्लीप डिस्क की समस्या से जूझने वाले ज्यादातर मरीजों में युवा ही हैं। एक अनुमान के अनुसार देश की पांच प्रतिशत आबादी स्लिप डिस्क की हल्की या गंभीर हो चुकी समस्या से जूझ रही है। सही समय पर इलाज करने से इससे आसानी से बचा जा सकता है।
क्या होता है स्लीप डिस्क
न्यूरो सर्जन डॉ. के.के. बंसल ने बताया कि हमारी रीढ़ की हड्डी में 33 हिस्से होते हैं जो डिस्क से जुड़े होते हैं। ये डिस्क रबड़ की तरह होती है, जो इन हड्डियों को जोडऩे के साथ उनको लचीलापन प्रदान करती है। वास्तव में ये डिस्क रीढ़ की हड्डी में लगे हुए ऐसे पैड होते हैं, जो उसे किसी प्रकार के झटके या दबाव से बचाते हैं। प्रत्येक डिस्क में दो भाग होते हैं, एक जेल जैसा आंतरिक भाग और दूसरा एक कड़ी बाहरी रिंग। चोट लगने या कमजोरी के कारण डिस्क का आंतरिक भाग बाहरी रिंग से बाहर निकल सकता है, इसे स्लिप डिस्क कहते हैं। एक ही पोजीशन में लंबे समय तक बैठे रहने, शरीर ज्यदा मोडऩे, अधिक वजन उठाने या गलत तरीके से झुकने जैसे कई ऐसे कारण हैं जिससे स्लीप डिस्क हो सकता है।
एंडोस्कोपिक सर्जरी से जल्दी रिकवरी
डॉ केके बंसल बताते हैं कि, स्लीप डिस्क का इलाज कई चरणों में होता है। सबसे पहले मरीज को फीजियोथेपी दी जाती है और कुछ मेडिसिन से दर्द को नियंत्रित किया जाता है। फिजियोथेरेपी में कुछ विशेष व्यायाम से दर्द को कम करने का प्रयास किया जाता है और अगर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है तो मरीज की सर्जरी करनी पड़ती है। डॉ. के.के. बंसल ने बताया कि डिस्क से जुड़े भाग जो कि बाहर की तरह आने लगते हैं उन्हें ठीक करना इस सर्जरी का लक्ष्य होता है। इस प्रक्रिया को डिस्केटोमी के नाम से जाना जाता है। एंडोस्कोपिक डिस्केटॉमी से मरीज की छोटे चीरे से सर्जरी की जाती है। यह सर्जरी बहुत सुरक्षित होती है और मरीज सर्जरी के एक से डेढ़ महीने बाद ही अपनी सामान्य दिनचर्या व्यतीत कर सकता है। अगर कुछ सावधानियों का ध्यान रखा जाए तो मरीज कमर दर्द से बच सकता है। व्यायाम करते समय कमर पर उसका अधिक दबाव न आने पर ध्यान देना चाहिए।  उठने-बैठने के तरीकों को ठीक करें। बैठते वक्त सीधे तन कर बैठें, कमर में झुकाव न लाएं। क्षमता से ज्यादा वजन न उठाएं और नरम बिस्तर की बजाए सपाट पलंग पर सोएं जिससे पीठ की मांसपेशियों को आराम मिले।
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