प्रकृत्ति के चक्र को समझने में हो रही गलती........

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पानी हमारे बीच से धीरे धीरे गायब होता चला गया। देश दुनिया में पानी के सीधे उपयोग खेतीबाड़ी, घरेलू कार्य व उद्योगों में होते है। वर्षा का पानी ही इन सबका आधार होता है। जबसे जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापमान ने असर दिखाने शुरू किये जलचक्र पर इसका पहला और सीधा असर पड़ा और अपने ही देश में विभिन्न मौसमों के बदलते स्वभाव में ये साफ दिखाई देता है। 


जल और वायु ही पृथ्वी पर जीवन तय करते हैं। ये जलवायु ही है जो पृथ्वी की सभी क्रियाओं को नियंत्रित करती है और एक पारिस्थितिकी चक्र की तरह व्यवहार करती है। दुर्भाग्य से हमसे प्रकृति के इस चक्र को ना समझने की गलती हुई है उसी ने प्रकृति के सारे प्रबंधन को हमारे हाथ से बाहर कर दिया। पारिस्थितिकी तंत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जलचक्र है। मसलन अपने देश में मानसून दक्षिण भारत के समुद्री वाष्पोत्सर्जन के कारण आता है और उसी समय उत्तर भारत में बढ़ते तापक्रम के कारण वायु के दबाव बनते है तब मानसून की दिशा तैयार होती है। ये मानसून ही है जो प्रकृति का जीवन को पालने का सबसे बड़ा माध्यम है। मानसून उत्तर भारत में हिमखंडों से लेकर सब जगह वर्षा के माध्यम से नदियों, तालाबों, पोखरों व नालों तक पानी पंहुचाता है और इसके बेहतर संरक्षण का दायित्व प्रकृति ने वनों को दिया है। हमने अपने विकास के तथाकथित महत्वकांक्षाओं के चलते प्रकृति के इस चक्र पर चोट की जिसकी समझ हमें बहुत देर से आयी। आज पानी पूरी तरह से हमारे नियंत्रण से बाहर है। इसका सबसे बड़ा कारण पृथ्वी के तापक्रम में अप्रत्याशित बढ़ोतरी का होना है। सुविधाओं के लिये अति ऊर्जा के उपयोग हुए और इस बढ़ती खपत ने पृथ्वी के संतुलन पर चोट की। इसका पहला सीधा बड़ा असर इस जलचक्र पर पड़ा और इसके साथ ही हमारी प्राकृतिक वनों के प्रति नासमझी ने हमसे वनों का एकतरफा नाश भी कराया जिससे पृथ्वी की जल संग्रहण क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ा। पानी हमारे बीच से धीरे धीरे गायब होता चला गया। देश दुनिया में पानी के सीधे उपयोग खेतीबाड़ी, घरेलू कार्य व उद्योगों में होते है। वर्षा का पानी ही इन सबका आधार होता है। जबसे जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापमान ने असर दिखाने शुरू किये जलचक्र पर इसका पहला और सीधा असर पड़ा और अपने ही देश में विभिन्न मौसमों के बदलते स्वभाव में ये साफ दिखाई देता है। बारिश के जलचक्र को जलवायु परिवर्तन ने गड़बड़ा दिया और अगर ऐसा ही लगातार होता रहा तो आने वाले समय में यह सब हम पर भारी पडऩे वाला है। देश का कोई भी हिस्सा हो, हमने जलचक्र में एक बहुत बड़ा असंतुलन पैदा कर दिया है जिसकी वापसी जल्द ही संभव नही है। यही समय है इन सब परिवर्तनों को महसूस करके आने वाली रणनीति जल व कल के लिये तैयार करें।
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