कोरोना के खिलाफ वैज्ञानिकों की जंग


Karnataka Released Home Quarantine Persons List - कोरोना ...


इस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस नामक एक ऐसे दुष्चक्र में फंसी है जिससे निकलने के लिए असाधारण कदमों और उपायों की जरूरत है। अगर हालात काबू में न किए गए तो इससे धरती से जीवन के खत्म होने का ही संकट पैदा हो जाएगा। महामारी कोविड-19 फैलाने वाले कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या दुनिया में करीब साढ़े तीन लाख तक पहुंच गई है और 15 हजार से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं। हर रोज संक्रमित लोगों और मौतों की संख्या बढ़ती जा रही है और यह महामारी नए इलाकों में पांव पसारती जा रही है। चीन के वुहान से निकला यह वायरस आतंक का पर्याय बन गया है। चूंकि कोविड-19 एक नया वायरस है, इसलिए इसके बारे में वैज्ञानिकों के अनुमान दिन- ब-दिन बदलते जाएंगे। इसी नवीनता की वजह से वैज्ञानिक अभी असमंजस में हैं कि कोविड-19 से निपटने के सबसे कारगर तरीके क्या होंगे। इस नवीनता की बदौलत ही इसके खिलाफ हमारे पास फिलहाल कोई टीका नहीं है, जो कि रोकथाम का एक प्रमुख उपाय है। यह इतनी ही तेजी से फैलता जाएगा अगर हमने रोकथाम न की। इस रोकथाम के लिए हम सभी कुछ चीजें कर सकते हैं। हम अपने हाथ धो सकते हैं। चेहरे को छूने से बच सकते हैं। अगर हमें बुखार या खांसी है तो हम दूसरे लोगों से अपने आप को अलग रख सकते हैं और अगर हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिले हैं जिसे कोविड-19 हुआ है तो हम अपनी जांच करवा सकते हैं। अब तक हमारे पास कोविड-19 का कोई विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। इसलिए अभी लक्षणों का ही इलाज किया जा रहा है। इसका मतलब यही है कि रोगी को सांस लेने में सहायता मिले, बुखार पर नियंत्रण रखा जाए और पर्याप्त तरल शरीर में पहुंचाया जाए। फिर भी वैज्ञानिकों ने कुछ उपाय सुझाए हैं और कुछ प्रगति भी की है। बहरहाल इस संदर्भ में वर्तमान में दो रास्ते अपनाए जा रहे हैं। पहला रास्ता है कि पुराने एंटी वायरल दवाओं को कोविड-19 के उपचार में इस्तेमाल करने की कोशिश करना। वैसे भी अभी हाल तक हमारे पास वास्तव में कारगर एंटी वायरल दवाइयां बहुत कम थीं। खास तौर से ऐसे वायरसों के खिलाफ औषधियों की बेहद कमी थी, जो जेनेटिक सामग्री के रूप में डीएनए के बजाय आरएनए का उपयोग करते हैं, जिन्हें रेट्रोवायरस कहते हैं। कोरोना वायरस इसी किस्म का वायरस है और कोविड-19 तो एक नया वायरस या किसी पुराने वायरस की नई किस्म है। लेकिन हाल के वर्षों में वैज्ञानिक शोधों की बदौलत हमारे एंटी वायरल जखीरे में काफी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। ऐसा कतई नहीं है कि दो-चार रोज में दवा बाजार में आ जाएगी। जो भी दवा इस रोग में कारगर दिख सकती है उसकी तरह-तरह से विविध परिस्थितियों में जांच करनी होगी, ताकि उसके दुष्प्रभाव जाने जा सकें, उसे प्रभावशाली बनाया जा सके। विज्ञान पत्रिका द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक वॉशिंगटन में कोविड-19 से संक्रमित एक व्यक्ति के इलाज के लिए एंटी वायरल दवा रेमडेसिविर का इस्तेमाल किया गया। यह दवा मूलत: इबोला वायरस के उपचार के लिए विकसित की गई थी और इसे कोविड-19 के संदर्भ में अभी तक मंज़ूरी नहीं मिली है। हालांकि विशेष मंज़ूरी लेकर जब मरीज को यह दवा दी गई तो वह स्वस्थ हो गया। वैज्ञानिकों ने रेमडेसिविर को प्रयोगशाला में जंतु मॉडल्स में अन्य कोरोना वायरस के खिलाफ भी परखा है। लेकिन यह नहीं दर्शाया जा सका है कि यह दवा सुरक्षित है और न ही यह कहा जा सकता है कि यह कारगर है।
हाल में कुछ शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कई एंटी वायरल दवाओं का परीक्षण कोविड-19 पर किया है। यह पता चला है कि रेमडेसिविर कम से कम प्रयोगशाला की तश्तरी में तो इस वायरस को प्रजनन करने से रोक देती है। आम मलेरियारोधी औषधि क्लोरोक्विन प्रयोगशाला में कोविड-19 को मानव कोशिकाओं में आगे बढऩे से रोकती है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एंटी माइक्रोबियल एजेंट्स पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक शोधकर्ताओं ने इस महीने के आरंभ में मरीजों को मलेरिया-रोधी हाइड्रोक्सी- क्लोरोक्विन और एंटीबायोटिक एजिथ्रोमाइसिन की खुराक दी थी। जयपुर के चिकित्सकों ने तीन मरीजों को एड्स की दवाओं से ठीक किया है। ऐसा माना जा रहा है कि ये तीनों दवाइयां आगे परीक्षण के लिए उपयुक्त हैं। इस बीच चीनी चिकित्सकों ने यह दावा किया है कि कोविड-19 के इलाज में जापान की नई एंटी फ्लू दवा बेहद कारगर साबित हुई है। दूसरा रास्ता है कि इसके लिए वैक्सीन की खोज को निरंतर जारी रखी जाए। दरअसल जब कोई वायरस शरीर में प्रवेश करता है तो उसे कोशिकाओं के अंदर पहुंचना पड़ता है। कोशिकाओं में प्रवेश पाने के लिए वह कोशिका की सतह पर किसी प्रोटीन से जुड़ता है। यह प्रोटीन रिसेप्टर- प्रोटीन कहलाता है। वायरस के रिसेप्टर मानव कोशिका झिल्ली (ह्यूमन सेल मेंब्रेन) को तोड़ देते हैं और कोशिकाओं में घुस जाते हैं। वायरस को कोशिकाओं में घुसने और उन्हें संक्रमित करने के लिए इस प्रक्रिया की जरूरत होती है। शोधकर्ता कोरोना वायरस के इसी रिसेप्टर को लक्षित करके वैक्सीन विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनका मानना है कि अगर वायरस के स्पाइक प्रोटीन रिसेप्टर को लॉक कर दिया जाए तो उसे मानव कोशिकाओं में घुसपैठ करने से रोका जा सकता है। वैज्ञानिक वायरस के संक्रमण के किसी भी चरण में बाधा पहुंचाकर वायरस का प्रसार रोक सकते हैं। करीब 20 वैक्सीन अभी विकास की अवस्था में हैं और एक वैक्सीन के जानवरों पर परीक्षण से पहले ही मनुष्यों पर ट्रायल शुरू हो गया है। जैव सूचना और कृत्रिम जीव-विज्ञान के समन्वय से पूरी तस्वीर बदल गई है। कोविड-19 कोरोना वायरस के जीनोम के प्रकाशित होने के सिर्फ 42 दिनों में बायोटेक कंपनी मॉडर्न थेरेप्यूटिक्स ने क्लिनिकल परीक्षण के लिए अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज को वैक्सीन भेज दिए, जो अप्रैल में शुरू होना प्रस्तावित है।

ठान लो तो जीत है...
कांगड़ा जिले के धमेटा की महिला दर्जी हो या नूरपुर के राजू... मास्क बना रहे हैं इन दिनों। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस वातावरण में जब कोई प्राणवायु ले तो वह कुख्यात वायरस दूर रहे। वायरस, जिसने चीन, इटली और कई देशों के बाद अंतत: भारत पर भी असर दिखाना शुरू किया है। आपातस्थिति से निपटने के लिए पूरे देश के साथ हिमाचल प्रदेश भी जूझ रहा है। पूरे देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा से पूर्व ही हिमाचल बंद हो चुका था। इस वातावरण में बुधवार को प्रदेश के सभी सांसदों ने करीब सवा दो करोड़ रुपये कोरोना के साथ जूझने के लिए समर्पित किए। इससे पूर्व परिवहन विभाग के कर्मचारी हों या खंड विकास अधिकारी संघ हो...अन्य संस्थाएं अपना-अपना योगदान किसी न किसी रूप में दे रही हैं। दरअसल आपदाकाल में परखा जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है धीरज। धीरज के अभाव में ही अफवाहें अपना रास्ता बनाती हैं और अचानक सैनिटाइजर और मास्क जैसी वस्तुएं लुप्त होने लगती हैं। अगर कालाबाजारी करने वाले हाथ एक पक्ष का पता देते हैं तो इस सबसे निपटने के लिए उठे तमाम हाथ उस भारत की प्रकृति हैं जो आपदा में भी साहस बुन लेते हैं। नूरपुर के राजू जैसे लोग जब मास्क बना रहे थे तो जाहिर है वे उस दीये की तरह अपना कर्तव्य निभा रहे थे, जो सूरज का विकल्प नहीं होता मगर रोशनी उसका धर्म है। हिमाचल में कोरोना वायरस के तीन मामले आए हैं। अमेरिका से लौटे तिब्बती की मौत हो चुकी है, जबकि दो उपचाराधीन हैं। हिमाचल के समाज की यह विसंगति बेहद अजीब है कि एक तरफ लोग मास्क सिल रहे हैं, पालमपुर स्थित हिमालयन जैव संपदा एवं प्रौद्योगिकी संस्थान सस्ता और गुणवत्ता वाला सैनिटाइजर बना रहे हैं, वहीं कुछ लोग जो 'पैनिक बाइंगÓ के शिकार हैं, यहां तक झूठ बालने में माहिर हैं कि उन्हें यात्रा वृतांत बताने में भी शर्म महसूस होती रही। कुछ लोगों ने स्वयं कहा कि वे विदेश से आए हैं, उनकी जांच की जाए। लेकिन कुछ लोग इतने अति आत्मविश्वासी निकले कि लोगों से शिकायतें मिलने पर प्रशासन को उन्हें उठाना पड़ा।  एक सरकारी स्कूल की प्रधानाचार्य हैं जिन्हें यह उचित नहीं लगा कि वह जांच करवाएं। लोगों को सब पता था और जब शिकायत हुई तो आराम से समझाने पर भी वह नहीं मानीं और स्कूल जाती रहीं। अंतत: प्रशासन ने जब सख्त रवैया अपनाया तो उन्हें समझ आया। सरकार जंजीर तोडऩा चाहती है, लेकिन यही लोग जंजीर को कड़ी दर कड़ी बांधना चाहते हैं। आम आदमी और खास आदमी में यही अंतर है। आम आदमी प्रधानमंत्री के कहने पर जनता कफ्र्यू का हिस्सा बनता है और शाम को थाली या घंटी भी बजाता है, वातावरण में सकारात्मकता भरता है। और खास आदमी ट्रैवल हिस्ट्री छिपाता है, सबको खतरे में डालता है, किसी के पास चाय पीता है, किसी से गले मिलता है। इस बीच कई पक्षों से यह शिकायत आती रही है कि अस्पतालों में भी मास्क और सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं हैं। हो तो यह भी सकता था कि जिस बजट को प्रदेश सरकार ने पारित किया, उसमें संशोधन करते हुए सभी क्षेत्रों का कुछकुछ बजट काटते हुए कोरोना के लिए रखा जाता। अब सांसदों और अन्य पक्षों की पहल से लड़ाई को आसान करने का प्रयास रहेगा, ऐसा दिख रहा है। हर अभूतपूर्व स्थिति अपने साथ चुनौती लाती है। वास्तव में उसी चुनौती में अवसर भी निहित होते हैं। 21 दिन घर बैठना जिन्हें मुश्किल लग रहा है, उन्हें यह अवश्य सोचना चाहिए कि जीवन से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। ये दिन संभवत: आत्मसाक्षात्कार के दिन हैं, अपनों को और अपने आप को समझने के दिन हैं। यह जीवन के उन तमाम पक्षों को जानने- बूझने के दिन हैं जिन्हें अन्यथा जीवन की आपाधापी में छोड़ दिया जाता है। यह समय एक-दूसरे के साथ न होकर भी एक-दूसरे के साथ होने का है। ये तीन सप्ताह अगर धैर्य के साथ सकारात्मकता का प्रचार-प्रसार करते हुए काट लिए जाएं तो यह स्वयं की ही मदद होगी। यह उन लोगों की मदद भी होगी, जो स्वयं को खतरे में डाल कर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि बाकी लोग घरों में रह सकें। कफ्र्यू के कुछ कायदे होते हैं। और यह स्थिति स्वास्थ्य से जुड़ी है इसलिए आवश्यक है कि इसका पालन किया जाए। 18 घंटे में हिमाचल में 82 मामले उल्लंघन के आना ठीक बात नहीं है। खासतौर पर तब, जब आवश्यक वस्तुओं के लिए समय निर्धारित है। यह और बात है कि वहां भी लोगों को उचित दूरी में रहना चाहिए। आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों की दिक्कतों का ध्यान रखना अधिकारियों का काम है। क्योंकि यह जंग नहीं है, अपितु स्वास्थ्य आपातकाल है, इसलिए हिमाचल सरकार को खासतौर पर ध्यान देना होगा कि मास्क और सैनिटाइजर वही लोग बनाएं जो इसके लिए अधिकृत हैं। 
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