लॉकडाउन के अनदेखे असर : मजदूर और कामगार प्रभावित न होने पाए ं


लॉकडाउन के अनदेखे असर: मजदूर और कामगार प्रभावित न होने पाएं

देश में 14 अप्रैल तक लॉकडाउन लागू है। इसके पीछे उद्देश्य कोरोना वायरस से उपजी बीमारी कोविड-19 को फैलने से रोकना है। महामारी के सिद्धांत को उसके रिप्रोडक्शन नंबर यानी प्रजनन संख्या के रूप में जाना जाता है। एडम कुचार्सिक ने अपनी पुस्तक 'द रूल ऑफ कंटाजिनÓ में लिखा है कि प्रजनन संख्या इस बात पर निर्भर करती है कि एक संक्रमित व्यक्ति औसतन कितने लोगों में संक्रमण फैलाएगा? किसी भी महामारी को रोकने के लिए यह जरूरी होता है कि प्रजनन संख्या पर नियंत्रण किया जाए। यह नियंत्रण लोगों का टीकाकरण करने और साथ ही उनकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर किया जा सकता है, लेकिन त्रासदी यह है कि कोरोना वायरस से उपजी महामारी के लिए अभी तक किसी भी तरह का टीका नहींबन पाया है। चूंकि इसके बनने में समय लगेगा इसलिए इस महामारी को बढऩे से रोकने के लिए फिलहाल एक ही तरीका है फिजिकल डिस्टेंसिंग। भारत की तरह दुनिया के अन्य अनेक देशों में लॉकडाउन का ही माध्यम चुना गया है। आज के हालात में यह पूरी तरह तर्कपूर्ण लगता है, लेकिन फ्रांसीसी अर्थशास्त्री फ्रेडरिक बास्टियाट ने लिखा है कि अर्थव्यवस्था के तहत एक अधिनियम, एक आदत, एक कानून केवल एकतरफा प्रभाव को जन्म नहीं देता, बल्कि प्रभावों की एक पूरी शृंखला को जन्म देता है। इन प्रभावों में से कुछ तत्काल प्रकट होने के कारण स्पष्ट दिखाई देते हैं, लेकिन शेष प्रभाव अदृश्य से रहते हैं। वे दिखते नहीं, लेकिन उनके प्रभाव असरकारी होते हैं। बास्टियाट यह भी लिखते हैं कि एक अच्छे और बुरे अर्थशास्त्री के बीच एक खास अंतर होता है। एक केवल दिखने वाले प्रभाव पर ही नजर रखता है, जबकि दूसरा उन अनदेखे प्रभावों पर भी नजर रखता है, जिनका पूर्वानुमान लगाना जरूरी होता है। लॉकडाउन का भारतीय अर्थव्यवस्था पर काफी नकारात्मक असर पड़ रहा है। इस सीधे दिखने वाले नकारात्मक असर से सरकार वाकिफ है। सरकार ने इस नकारात्मक प्रभाव को कम करने की कोशिश भी की है। उसकी ओर से महिला जन-धन खाताधारकों के खातों में पैसे जमा किए जाएंगे और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि दी जाएगी। इसके अलावा और भी कई कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन इन सबके बीच केंद्रीय सत्ता का ध्यान इस ओर नहीं गया कि भारत का लगभग 92 प्रतिशत कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा है और इसका एक खास हिस्सा प्रवासी मजदूरों का है। वर्ष 2016-2017 का इकोनॉमिक सर्वे बताता है कि हर साल भारत में लगभग 50 से 90 लाख लोगों का पलायन होता है। 2015-16 में पलायन करने वालों का आधा हिस्सा दिल्ली और उसके आस- पास के इलाकों में आकर बसा। आधे से ज्यादा पलायन करने वाले लोग उत्तर प्रदेश और बिहार से थे। हाल में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया था कि 2011 की जनगणना के हिसाब से कामगारों की संख्या 48.2 करोड़ है। अनुमान है कि 2016 में यह संख्या बढ़ कर 50 करोड़ से अधिक हो गई होगी और इस समय उससे भी अधिक। जैसे ही लॉकडाउन की घोषणा हुई और करीब-करीब सारे कल-कारखाने बंद होने लगे तो तमाम लोगों ने अपने घरेलू सहायकों को काम पर आने के लिए मना कर दिया।  यही स्थिति दिहाड़ी मजदूरों और अन्य कामगारों की बनी। ये घरेलू सहायक, मजदूर और अन्य कामगार बड़े शहरों को छोड़कर अपने-अपने गांव घर लौटने की तैयारी में जुट ही रहे थे कि ट्रेनों की आवाजाही बंद हो गई। ट्रेनों के साथ बसों का भी चक्का थम गया। ऐसे में उन्होंने घबराकर अपने गांव-घर के लिए पैदल ही रवानगी कर ली। पिछले कुछ दिनों तक मीडिया और सोशल मीडिया में उन कामगारों की खबरें तैर रही थीं जो पैदल चले जा रहे थे। कई कामगारों की मौत की भी खबर आई। एक तरह से देखें तो कोरोना वायरस से बचने का तरीका कामगारों पर भारी पड़ा। हम इसकी अनदेखी नहींकर सकते कि हमारी सरकार ने अलग-अलग देशों में फंसे भारतीयों को तो एयरलिफ्ट कराया, लेकिन इसका अहसास नहींकिया कि लॉकडाउन का आंतरिक प्रवासियों पर क्या असर पड़ेगा? असंगठित क्षेत्र के कामगारों और श्रमिकों पर लॉकडाउन का क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका सरकार को पूर्वानुमान होना चाहिए था, मगर अफसोस कि ऐसा हुआ नहीं। लॉकडाउन की घोषणा के समय यह बेहद महत्वपूर्ण था कि सरकार देश के वैसे प्रवासी मजदूरों, जो असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं, जिनके पास नाम मात्र की बचत है और जिनकी जीविका प्रतिदिन होने वाली आय पर निर्भर करती है, की चिंताओं का समाधान करती।

 इसके साथ ही बड़े शहरों खासकर दिल्ली और मुंबई आदि में जहां इन मजदूरों की संख्या भारी तादाद में है वहां निश्चित तौर पर उनके खाने-पीने और रहने की उचित व्यवस्था प्राथमकिता के आधार पर होनी चाहिए थी। हालांकि यह भी सच है कि भारत सरकार की सीमित क्षमताओं की वजह से यह सब इतनी जल्दी करना आसान भी नहीं होता, लेकिन वह एक बेहतर विकल्प होता। कम से कम अब तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मजदूर और कामगार लॉकडाउन के अनदेखे असर से प्रभावित न होने पाएं। इसी के साथ सरकार को लॉकडाउन के अन्य अनदेखे असर भी देखने चाहिए, क्योंकि अभी लॉकडाउन के करीब दो सप्ताह शेष हैं।
कोरोना की आड़ में बढ़ा साइबर हमलों का खतरा 
 दुनियाभर में कोरोना संकट की आड़ में साइबर हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं। आम लोगों से साइबर ठगी के मामले बढ़े हैं। सरकारी संस्थानों, अस्पतालों से लेकर कंपनियों तक के डाटा लीक के मामले सामने आए हैं। भारत में ही पिछले तीन महीने में 10,000 से ज्यादा साइबर हमले किए जा चुके हैं। महाराष्ट्र साइबर सेल के मुताबिक लोगों के मोबाइल और ई-मेल पर कोरोना वायरस से बचने के उपायों वाला एक लिंक भेज कर उन्हें शिकार बनाया रहा है। इस लिंक पर क्लिक करते ही लोगों के बैंक खातों से जुड़ी जानकारी उन लोगों तक पहुंच रही है, जो इस साजिश के पीछे है।  पूरे विश्व में खौफ का पर्याय बन चुके कोरोना वायरस को ठगों ने अपना हथियार बना लिया है। कोरोना वायरस  के नाम पर न केवल लोगों के व्यक्तिगत डाटा बल्कि बैंक अकाउंट तक को साफ किया जा रहा है।
कैसे ठगी का शिकार बन रहे हैं लोग
कोरोना वायरस से जुड़ी कोई जानकारी, सावधानियों से जुड़ा कोई भी मेल, मैसेज या वाट्सऐप पर आने पर, उस पर महज एक क्लिक ही आपको ठगी का शिकार बना सकता है। इस लिंक पर क्लिक करते ही लोगों के बैंक खातों से जुड़ी जानकारी उन लोगों तक पहुंच रही है, जो इस साजि़श के पीछे हैं।  साइबर सेल ने बताया कि कई हैकर लोगों की इस जानकारी का इस्तेमाल उनके बैंक खातों में पड़ी रकम पर सेंध लगाने में कर सकते हैं। लगातार बढ़ रहे इन मामलों को लेकर महाराष्ट्र साइबर सेल ने लोगों को अलर्ट किया है।
दरअसल पिछले साल नवंबर महीने में चीन के वुहान से फैले कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। हर कोई इस वायरस की खबर से डर हुआ है, यही डर हैकर्स का वो हथियार बना हुआ है जिसका इस्तेमाल कर वे चोरी किए गए डाटा से लोगों को कोरोना वायरस से जुड़ी हुई जानकारियां, सावधानी, पहचान के तरीके और बचने के लिए उपाय मेल, मैसेज, वाट्सऐप पर लिंक व आर्टिकल्स डालते हैं। पिछले कुछ समय से जिस तरह कोरोना वायरस को लेकर पूरे देशभर में माहौल है, उसी के चलते लोग इन लिंक्स पर जहां क्लिक करते हैं। वैसे ही उस शख्स की सभी पर्सनल इन्फॉर्मेशन हैकर के पास पहुंच जाती है, इतना ही नहीं साथ-साथ आपके डाटा, मेल, वाट्सऐप, मैसेज में मौजूद अन्य लोगों से जुड़ी जानकारी भी हैकर्स तक पहुंचती हैं, जिसका इस्तेमाल वो अपने अगले टारगेट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
अमेरिका से लेकर कई देशों में मामले

हाल में ही अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग पर साइबर अटैक का मामला सामने आया है। 'ब्लूमबर्ग' की रिपोर्ट के अनुसार, हैकर्स ने कोरोना वायरस से जुड़ी अफवाह फैलाने के मकसद से हैकिंग की थी। हैकिंग की खबर मिलते ही अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद फौरन हरकत में आई और मामले को संभालते हुए एक ट्वीट कर स्पष्टीकरण दिया। अमेरिकी अधिकारियों ने महसूस किया कि स्वास्थ्य विभाग के सर्वर में घुसपैठ हुई है और कोरोनो वायरस के बारे में झूठी सूचना प्रसारित हो रही है, जिसके बाद उनकी टीम ने इसे रोकने की कोशिश की। रिपोट्र्स के अनुसार, यह भी कहा जा रहा है कि विभाग के सिस्टम को धीमा करने के लिए इस हैकिंग को अंजाम दिया गया था। साइबर अटैक की वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की ओर से रातोंरात एक ट्वीट किया गया। साइबर सुरक्षा के समक्ष खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं। ये खतरे सारी दुनिया में बढ़ रहे हैं और इसका एक बड़ा कारण यह है कि साइबर सेंधमारी करने वालें तत्वों की पहचान भी मुश्किल है और उन तक पहुंच भी। इंटरनेट वायरस अथवा हैकिंग के जरिए सेंधमारी वह अपराध है जिसमें आमतौर पर अपराधी घटनास्थल से दूर होता है। कई बार तो वह किसी दूसरे देश में होता है और ज्यादातर मामलों में उसकी पहचान छिपी ही रहती है। यह ठीक है कि भारत में साइबर सुरक्षा के प्रति सजगता बढ़ी है, लेकिन उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। साइबर सुरक्षा को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए जैसे तंत्र का निर्माण अब तक हो जाना चाहिए था वह नहीं हो सका है। यह सही है कि साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई संस्थाएं बनाई गई हैं, लेकिन उनके बीच अपेक्षित तालमेल का अभाव अभी भी दिखता है। भारत में ही पिछले तीन महीने के दौरान 10,000 स्पैम अटैक किए गए। ऑस्ट्रेलिया में 6,000, तो इंडोनेशिया में 5,000 के करीब साइबर अटैक के प्रयास हुए। यही नहीं चेक रिपब्लिक में कोरोना टेस्टिंग की सबसे बड़ी लैब को निशाना बनाते हुए साइबर हमला किया गया है। ई-मेल हैकर्स विश्वास बनाए रखने के लिए किसी एनजीओ या विश्व स्वास्थ्य संगठन के नाम पर मेल भेजते हैं ताकि कोई शक न हो। इसके अलावा ऐसी भाषा का भी प्रयोग करते हैं कि लोग डर के या फिर उत्सुकता में मेल में दिए लिंक को क्लिक करें। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना वायरस से जुड़ा कोई भी संदेश जब यूजर्स क्लिक करता है तो वायरस मोबाइल में 'डाउनलोड' हो जाता है, जिसके जरिए मोबाइल की पूरी 'एक्सेस' हैकर को मिल सकती है। इसके जरिए हैकर आपके पेटीएम, डिजिटल मनी से जुड़े अकाउंट में आसानी से सेंध लगा सकता है। कुल मिलाकर कोरोना की आड़ में साइबर ठगों से बचें ,किसी भी तरह के संदेहास्पद लिंक को मोबाइल या मेल से क्लिक न करें, घर पर स्वस्थ रहें और सुरक्षित रहें।
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