कोरोना का सामना करने में हमें विविधता में एकता को बनाए रखना होगा

We must maintain sense of unity in diversity in facing Corona ...





तमाम जीवाणु-विषाणु सदा से मानव इतिहास की धारा को प्रभावित करते आए हैं। मानव सभ्यता के उत्थान और पतन में उनकी अहम भूमिकाएं रही हैं। हालिया दौर में हमने सार्स और मर्स का प्रकोप देखा है। करीब सौ साल पहले स्पेनिश फ्लू की कटु स्मृतियां भी हैं। साफ है कि यह पहला अवसर नहीं जब किसी अदृश्य शत्रु ने मानव जाति को इस कदर भयाक्रांत किया है। मौजूदा हालात ने खतरे से निपटने की हमारी तैयारी, शोध के स्तर और राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ ही आर्थिक एवं वित्तीय तंत्र की हमारी कमजोरियों की पोल खोल दी है। भारत का स्वास्थ्य बजट जीडीपी के 1.5 फीसद से कम बना हुआ है। वर्ष 2009-10 में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च 621 रुपये था जो 2017-18 में बढकऱ भले ही 1,657 रुपये हो गया, लेकिन यह अभी भी बहुत कम है। तिस पर भारत के इस बजट का मामूली हिस्सा ही संक्रामक रोगों से निपटने में खर्च होता है जबकि देश में 70 प्रतिशत मरीज इन्हीं बीमारियों से मरते हैं। स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन न दिए जाने का ही नतीजा है कि देश में स्वास्थ्य ढांचा इतना लचर है। कुछ आंकड़ों से यह तस्वीर और स्पष्ट होती है। ब्रुकिंग्स इंडिया के अनुसार प्रति एक हजार लोगों पर हमारे अस्पतालों में केवल 0.55 बेड है यानी हजार लोगों के लिए एक बिस्तर तक नहीं। जिन 12 राज्यों में देश की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है, उनके निराशाजनक आंकड़ों की पड़ताल और बदतर स्थिति दिखाती है। इन राज्यों के मानदंड राष्ट्रीय औसत से भी कमजोर हैं। इनमें मध्य, उत्तर और पश्चिम भारत के वे राज्य शामिल हैं जहां कोविड-19 के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। जब शहरी-ग्रामीण आर्थिक असमानता पर गौर करते हैं तो स्वास्थ्य तंत्र के समक्ष किसी महामारी का संकट और भयावह लगने लगता है। चालू वित्त वर्ष में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए आवंटन बहुत कम है। ऐसे में तत्काल यह आवंटन बढ़ाया जाए। पहले से पस्त भारतीय अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों पर कोरोना महामारी और बड़ी आपदा बनकर टूटी है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने आशंका जताई है कि इसके चलते भारत में असंगठित क्षेत्र के तकरीबन 40 करोड़ कामगार गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाएंगे। ऐसे में उद्योग जगत को सहारा देने के लिए दीर्घावधिक रणनीति बनाने की दरकार है। इनमें कर्ज में राहत, ब्याज दरों में कमी, कर्मचारियों के लिए सरकार की ओर से प्रोत्साहन में वृद्धि, विसंक्रमित कार्यस्थलों का विकास और ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए संस्थागत सहयोग बढ़ाया जाना चाहिए जिसमें आपसी संपर्क की कम से कम जरूरत पड़े। कृषि को भी बड़ा सहारा दिया जाना चाहिए। उसके लिए उदार नीतियां बनें। कृषि उत्पादों की खरीद सुनिश्चित हो। कृषि की लागत घटाई जाए। साथ ही जब तक यह विपदा विदा नहीं होती तब तक कृषि ऋण देने और उसे वसूलने में उदारता दिखाई जाए। जीएसटी और आयकर की दरों में कमी कर उनके अनुपालन का भार भी हल्का किया जाना चाहिए। चूंकि कोरोना का कोई इलाज नहीं तो उसे रोकने के लिए शारीरिक दूरी और वैयक्तिक स्वच्छता ही मूलमंत्र बने हुए हैं। ये रणनीतियां प्रभावी भी साबित हुई हैं। इस दौरान लोगों से घरों में रहने के लिए कहा जा रहा है। अफसोस की बात है कि देश में तमाम लोग ऐसे हैं जिनके पास वहां अपने घर की सुविधा नहीं जहां वे कामकाज के सिलसिले में रहते हैं। देश के विभिन्न इलाकों से बड़े पैमाने पर हुए पलायन की त्रासद तस्वीरों से यह स्पष्ट भी होता है। हमारी आधी से अधिक आबादी ऐसी है जो कुछ दिनों की जरूरत का ही सामान अपने पास रखने में सक्षम है। जरूरी सामान के लिए उसे खुद बाहर निकलना होगा या फिर सामान उस तकपहुंचाना होगा। ऐसे जरूरतमंद लोगों के घर तक जरूरी सामान की आपूर्ति के लिए डाक विभाग और कुरियर कंपनियों की मदद ली जानी चाहिए। स्वास्थ्यकर्मी हमारी अमूल्य धरोहर हैं। वे इस वक्त संकटमोचक बने हुए हैं। हमारा दायित्व है कि उनकी मुश्किलें आसान करें। उन्हें जरूरी प्रोटेक्टिव गियर, उपकरण और दवाएं उपलब्ध कराई जाएं ताकि वे मरीजों का उचित उपचार कर सकें। ऐसा नहीं कि भारत के पास कच्चे माल, तकनीकी ज्ञान और उद्यमिता के उत्साह की कमी है, लेकिन पूंजी, मानकीकरण, परीक्षण सुविधाओं और खरीद प्रक्रिया जैसे पहलू इसमें अवरोध बने हैं। लालफीताशाही को दूर करने के लिए एक पारदर्शी आपात खरीद नीति समय की जरूरत हो चली है। किफायती वेंटिलेटर बनाने के तमाम प्रतिरूप सामने आए हैं, उन पर गंभीरतापूर्वक विचार कर इस कमी को पूरा करने की दिशा में कदम उठाए जाएं। देश में तमाम डॉक्टर सिविल सेवा, सैन्य बलों और दवा उद्योग जैसे गैर-चिकित्सीय पेशों में लगे हैं। इन्हें भी अग्रिम मोर्चे पर लगे स्वास्थ्यकर्मियों की सहायता में लगाया जाना चाहिए। हाल में सेवानिवृत्त डॉक्टरों और नर्सों को भी वापस बुलाया जा सकता है। कोविड-19 की जांच में सामूहिक नमूनों के मामले में ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान और उन्हें आइसोलेट किया जाए। इससे टेस्टिंग किट्स की तंग आपूर्ति से कुछ हद तक निपटा जा सकता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के चारों सदस्यों में से किसी के पास भी जैविक आपदा से निपटने का अनुभव नहीं। इसलिए स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक को तत्काल प्रभाव से इस संस्था में जोड़ा जाना चाहिए। इस मामले में ताइवान से सीख लेते हुए एक लचीली राष्ट्रीय कमान बनाई जा सकती है जिसमें विभिन्न विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। सोशल मीडिया के दौर में सही सूचनाओं के प्रसार और अफवाहों पर विराम बहुत जरूरी है। आपदा से सफलतापूर्वक निपटना लोकतांत्रिक संस्थाओं और सुशासन में जनता के भरोसे को और पुख्ता बनाएगा। इस कड़वी हकीकत को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि विपत्ति में सबसे ज्यादा मुसीबत भी वंचित वर्गों को झेलनी पड़ती है। इस चुनौती का एकजुटता से सामना करने में हमें अपनी विविधता में एकता के भाव को बनाए रखना होगा। परस्पर निर्भरता के भाव को समझकर हम अपनी इस शक्ति का बेहतर लाभ उठा सकते हैं। इस आपदा से हमें यह सबक अवश्य लेना चाहिए कि भविष्य में ऐसे किसी संकट से बचाव के लिए दीर्घकालिक नीतियां और कार्यक्रम बनाए जाएं। यह लड़ाई प्रत्येक व्यक्ति की है और इसका श्रेय भी उन सभी को जाता है जो सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए छोटे-बड़े त्याग कर अपना दायित्व निभा रहे हैं।

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