लॉकडाउन से प्रकृति को भी मिली राहत


लॉकडाउन में हुआ ऐसा काम पर्यावरण के लिए बन गई वरदान


आज लॉकडाउन के कारण जनता को भले ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन पर्यावरण के मामले में इसका सकारात्मक पहलू सामने आया है। देश-दुनिया में प्रदूषण का स्तर काफी कम देखने को मिल रहा है। हवा काफी हद तक साफ हो गई है। लॉकडाउन के कारण पर्यावरण पर हुए सकारात्मक असर से यह बात साफ हो गई है कि यदि हमें पृथ्वी को बचाना है तो कोई कारगर नीति बनानी होगी। एक अनुमान के अनुसार घर के भीतर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है, जिनमें छह लाख बच्चे भी शामिल हैं। हमारे देश में निर्माण संबंधी गतिविधियों, औद्योगिक प्रदूषण, जीवाश्म ईंधन तथा वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। वैश्विक वायु गुणवत्ता रिपोर्ट-2019 में दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी दिल्ली एवं सबसे प्रदूषित शहर गाजियाबाद को घोषित किया गया था।  रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की 90 फीसद आबादी प्रदूषित हवा में सांस ले रही है। कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण विशेषज्ञ डेविड बोयड ने भी अपने एक वक्तव्य में कहा था कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से घातक प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं, जिससे उनका जीवन और स्वास्थ्य जोखिम भरा है। इसके बावजूद इस महामारी पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। डेविड बोयड के अनुसार दुनिया में हर घंटे 800 लोग मर रहे हैं, जिनमें से अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं झेलने के कई वर्षों बाद मर रहे हैं। कैंसर, सांस की बीमारियां और दिल के रोगों में प्रदूषित हवा के कारण लगातार वृद्धि हो रही है। पिछले दिनों एक अध्ययन में बताया गया था कि वायु प्रदूषण टाइप-2 मधुमेह को भी बढ़ा रहा है। वायु में मौजूद पीएम2.5 कण टाइप-2 मधुमेह के मामलों और मृत्यु को बढ़ाता है। इसे उच्च रक्तचाप के लिए भी जिम्मेदार माना गया है। हमारे देश में वायु प्रदूषण के कारण सांस की बीमारियों, हृदय की बीमारियों, हृदयाघात, फेफड़ों के कैंसर के कारण समय पूर्व मृत्यु की दर बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में लगातार वाहनों की संख्या बढऩे के कारण प्रदूषण और सांस से संबंधित विभिन्न बीमारियां पनप रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड के अनुसार स्वच्छ हवा प्राप्त करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए कुछ प्रयास किए जाने की जरूरत है। इनमें वायु गुणवत्ता एवं मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों की निगरानी, वायु प्रदूषण के स्रोतों का आकलन और जन-स्वास्थ्य परामर्शों समेत अन्य सूचनाओं को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना शामिल है। यह कटु सत्य है कि वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुआं है। वायु प्रदूषण पर इस तरह के अध्ययन न केवल वाहनों के माध्यम से होने वाले वायु प्रदूषण पर हमारी आंखें खोलते हैं, बल्कि जरूरत से ज्यादा ऐशोआराम की जिंदगी जीने की लालसा पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं। उल्लेखनीय है कि वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं है। इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन तथा सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर जैसे खतरनाक तत्व एवं गैसें होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक हैं। कार्बन मोनोऑक्साइड जब सांस के माध्यम से शरीर के अंदर पहुंचता है तो वहां हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन नामक तत्व बनाता है। इस तत्व के कारण शरीर में ऑक्सीजन का संचार सुचारू रूप से नहीं हो पाता है। नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड एवं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड भी कम खतरनाक नहीं हैं। नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड की तरह ही हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा घटाता है। वाहनों से निकलने वाला हाडड्रोकार्बन अल्प मात्रा में भी पौधों के लिए हानिकारक है। सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर छोटे-छोटे कणों के रूप में विभिन्न स्वास्थ्यगत समस्याएं पैदा करते हैं। ऐसे तत्व हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाकर सांस संबंधी रोग उत्पन्न करते हैं। दरअसल इस दौर में हमने वाहनों को सुविधा से ज्यादा समस्या बना लिया है। यही कारण है कि तेजी से बढ़ते वाहन हमारे लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। भले ही हमारे घर में गाड़ी खड़ी करने की जगह हो या नहीं हो, लेकिन पड़ोसी के पास गाड़ी है तो हमें भी गाड़ी चाहिए। झूठी प्रतिष्ठा अंतत: हमारे स्वास्थ्य को भी झुठला रही है। हालांकि सडक़ों पर वाहनों का दबाव कम करने के लिए बार-बार कार-पूल की सलाह दी जाती है। यानी एक जगह से आने-जाने वाले दो या अधिक लोगों को एक ही गाड़ी का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन झूठी प्रतिष्ठा के लिए इस सलाह को भी दरकिनार कर दिया जाता है। बहरहाल लॉकडाउन के कारण प्रदूषण का स्तर कम होना हमें एक सकारात्मक संदेश दे रहा है। अगर हम अब भी नहीं चेतते हैं तो यह अपने पैरों पर कुल्हाडी मारने जैसा होगा। हमें यह समझना होगा कि प्रदूषण कम होने पर ही पृथ्वी बच सकेगी।

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