भारतीय रेल से मजदूरों को बड़ी राहत

पीयूष गोयल बोले- रेलवे देश के किसी भी ...

लॉकडाउन के करीब दो महीने होने को आए हैं और देश के तमाम हिस्सों में साधन सवारी का इंतजार करते हुए काफी बड़ी संख्या में श्रमिक पैदल, साइकिल, ट्रकों या दूसरी सवारियों से जाते हुए दिख रहे हैं। इनको लेकर देश में राजनीति भी गरम है और रेलवे पर भी तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं कि वह लोगों को क्यों पैदल जाने दे रही है। भारतीय रेल ने एक मई से श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू किया: दरअसल हमारे परिवहन साधनों में केवल उसी में क्षमता है कि वह इतनी बड़ी संख्या में फंसे लोगों और खास तौर पर प्रवासी श्रमिकों को गंतव्य तक पहुंचा दे। लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि भारतीय रेल ने एक मई से श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का संचालन शुरू किया और 20 मई तक 1,173 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की मदद से 23.5 लाख श्रमिकों को उनके गंतव्य स्थल तक पहुंचाया है। रेलवे स्टेशनों पर प्रवासियों की भारी भीड़ जमा : जहां प्रवासियों की संख्या अधिक है, वहां के रेलवे स्टेशनों पर प्रवासियों की भारी भीड़ जमा हो रही है और कई तरह की दिक्कतें भी आ रही हैं। बीते कई दिनों से रेलवे ने 300 ट्रेनों की तैयारी कर रखी है, लेकिन राज्यों की उदासीनता, प्रशासनिक कारणों और अन्य वजहों से गति धीमी रही। 14 मई के बाद यह स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है। रेलवे ने 12 मई से 15 जोड़ी राजधानी टाइप स्पेशल ट्रेनें शुरू की हैं, जिनका टिकट यात्री स्वयं बुक करके यात्र कर रहे हैं, उनको लेकर समस्या नहीं है। लेकिन इन श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में लिस्ट बनाने से लेकर उनके चयन का काम राज्यों के जिम्मे है। समस्या इसी नाते आ रही है। इन ट्रेनों के संचालन में राज्यों की अनुमति को शामिल करना एक बाधा की तरह दिखा। देश के सभी हिस्सों में लॉकडाउन के नाते कई जगहों पर प्रवासी श्रमिकों के पास घर वापसी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। कुछ जगहों पर राज्यों की ओर से उनको मदद मिलने में बाधाओं के नाते और बड़ी संख्या में लोग पलायन को विवश हुए। हालांकि भारत सरकार ने प्रवासी श्रमिकों को पहले बसों से ढोने का विकल्प रखा, लेकिन बेहद लंबी दूरी वाली जगहों से उनको बसों से लाना आसान काम नहीं था। इस नाते जिन जगहों पर प्रवासी श्रमिक अधिक हैं और जिन जगहों के प्रवासी श्रमिक बाहर फंसे हैं, उनके मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री से विशेष रेलगाड़ी चलाने का अनुरोध किया था। आरंभिक आकलन में पाया गया था कि पंजाब में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के करीब 10 लाख प्रवासी मजदूर फंसे थे। झारखंड के करीब नौ लाख लोग दूसरे राज्यों में फंसे थे जिसमें से छह लाख से अधिक प्रवासी मजदूर थे। केरल में फंसे प्रवासी मजदूरों की संख्या साढ़े तीन लाख थी। राजस्थान सरकार ने प्रवासी श्रमिकों की वापसी के लिए जो ऑनलाइन पोर्टल बनाया उस पर करीब छह लाख 35 हजार श्रमिकों और प्रवासियों ने पंजीकरण कराया। बिहार सरकार ने पहले आनाकानी की, फिर 28 लाख लोगों का आकलन किया। इसी के बाद केंद्रीय गृह मंत्रलय ने विभिन्न राज्यों में फंसे प्रवासी श्रमिकों, छात्रों, पर्यटकों और अन्य श्रेणी के लोगों को सुविधाजनक तरीके से अपने राज्यों में पहुंचाने के लिए एक मई से श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने की मंजूरी दी। सुचारू समन्वय के लिए रेलवे और संबंधित राज्य सरकारों की ओर से नोडल अधिकारी तैनात हुए। इसके पूरे स्वरूप को लेकर आरंभ से ही विवाद और उलझन रही। हालांकि आरंभ में ही रेलवे ने साफ कर दिया था कि केवल राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित यात्रियों को ही वह स्वीकार करेगी, क्योंकि ये गाडिय़ां उनके अनुरोध पर ही चल रही हैं। अन्य यात्री समूह स्टेशन पर नहीं पहुंचे। लेकिन भीड़ उमडऩे लगी।
इस बीच रेलवे की ओर से तीन सौ ट्रेन रोज चलाने की तैयारी के बाद भी आंकड़े बताते हैं कि किस तरह राज्यों की तैयारी धीमी रही। आरंभिक 10 दिनों में केवल 366 ट्रेनें चलीं, जिसमें सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश के लिए थी। पश्चिम बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों की भूमिका को लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हुए। 20 मई को प्रवासी श्रमिकों की घर वापसी तब तेज हुई जब 204 ट्रेनों के चलाने का रिकॉर्ड बना। इस बीच उत्तर प्रदेश औरैया समेत देश के अन्य इलाकों में सडक़ दुर्घटनाओं में बड़ी संख्या में मजदूरों के मारे जाने के बाद केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने अपने रुख में थोड़ी नरमी लानी शुरू की, जिसके बाद श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के संचालन की गति थोड़ी तेज हुई है, लेकिन इस बीच बड़ी संख्या में श्रमिक पैदल या दूसरे साधनों से तमाम जगहों से निकल चुके हैं। रेलवे ने राज्य सरकारों को इन प्रवासियों को नजदीकी जिला मुख्यालयों में उनका पंजीकरण करने के बाद रेलवे स्टेशनों तक पहुंचाने को कहा, ताकि इनकी यात्र की व्यवस्था हो सके।
वैसे तो केंद्रीय गृह मंत्रलय और कैबिनेट सचिव ने भी राज्यों को हिदायत दी है कि वे बिना किसी बाधा के अधिक से अधिक श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने में सहयोग करें, ताकि दूसरे राज्यों में पलायन करके गए श्रमिक तेजी से अपने घर पहुंच सकें। गृह मंत्रलय ने 19 मई को राज्यों को भेजे पत्र में कहा है कि भय और आजीविका छिनने की आशंका से विभिन्न स्थानों पर फंसे श्रमिक अपने-अपने घरों को जाने के लिए व्याकुल हैं। इनकी कठिनाइयों को कम करने के लिए समन्वय सुनिश्चित कर और स्पेशल ट्रेनें चलाएं। भारतीय रेलवे एक जून 2020 से 200 नई नॉन एसी ट्रेनें समय सारणी के साथ शुरू करेगी। इस फैसले से कुछ राहत जरूर मिलेगी, लेकिन मौजूदा स्थिति को लेकर जहां राज्य सरकारों की भूमिका की काफी आलोचना हुई है, वहीं संसाधनों के मामले में सबसे महाबली भारतीय रेल की भी। अगर बेहतर आयोजना होती तो एक सप्ताह के भीतर सारे जरूरतमंदों को गंतव्य तक भेजा जा सकता था। इससे प्रवासी मजदूरों की यह त्रसदी सामने नहीं आती और वे सही सलामत अपने-अपने घर पहुंच गए होते।
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