अर्थव्यवस्था का थमा पहिया फिर से घूमे

अर्थव्यवस्था का थमा पहिया फिर से घूमे, इसके लिए रेड, ऑरेंज जोन में दी गईं रियायतों की समीक्षा जरूरी


delhi. केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी विचार करना चाहिए। उन्हेंं विचार इस पर भी करना होगा कि आखिर मजदूर घर क्यों लौटना चाह रहे? इसका कारण यही है कि सरकारों ने उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था करने के जो तमाम दावे किए थे वे आधे-अधूरे साबित हुए। चूंकि मजदूरों को तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ा इसीलिए वे घर जाने को व्याकुल हुए और उनमें से तमाम दोबारा शहर न लौटने का मन बनाए हुए हैं। अगर वे वाकई फिर शहर नहीं लौटे तो एक नई मुसीबत खड़ी हो सकती है।

जैसी उम्मीद की जा रही थी वैसा ही हुआ, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कोरोना संक्रमण से बचे हुए और साथ ही संक्रमण से कम प्रभावित जिलों यानी ग्रीन और ऑरेंज जोन में तमाम रियायतें देते हुए लॉकडाउन को 17 मई तक बढ़ाने का फैसला किया। कोरोना संक्रमण से अधिक प्रभावित जिलों यानी रेड जोन में भी कुछ ढील दी गई है। इसका असर जो भी हो, रियायतों के साथ लॉकडाउन में एक और विस्तार यही संदेश दे रहा कि लोगों को अभी शारीरिक दूरी के प्रति सचेत रहने के साथ आवाजाही में भी सावधानी बरतनी होगी।
रेड और ऑरेंज जोन में कुछ शर्तों के साथ आवाजाही की इजाजत दी गई
वैसे आवाजाही को नियंत्रित रखने के लिए हवाई सेवाओं के साथ ट्रेन और मेट्रो सेवा पर अभी प्रतिबंध जारी रहेगा। इसी के साथ होटल, रेस्त्रां, बाजार, मॉल, सिनेमाघर और शिक्षण संस्थाओं आदि को भी खोलने की अनुमति नहीं दी गई है। जहां रेड और ऑरेंज जोन में कुछ शर्तों के साथ आवाजाही की इजाजत दी गई है, वहीं ग्रीन जोन में बसें चलाने की अनुमति दी गई है, लेकिन 50 प्रतिशत सवारियों के साथ। इसी कारण कहना कठिन है कि इससे कितना लाभ मिलेगा?
केंद्र सरकार कारोबारी गतिविधियों को तेज करने में जुटी
लॉकडाउन में एक और विस्तार के साथ केंद्र सरकार कारोबारी गतिविधियों को भी तेज करने में जुट गई है, लेकिन देश के करीब-करीब सभी प्रमुख महानगर रेड जोन में हैं और वही कारोबारी गतिविधियों के केंद्र यानी आर्थिक विकास के इंजन हैं। रेड जोन वाले जिलों में कोरोना मरीज अधिक होने का एक बड़ा कारण यह है कि उनमें कहीं अधिक घनी आबादी है। घनी आबादी पुराने मोहल्लों में तो है ही, झुग्गी बस्तियों और अनियमित तरीके से बसी कॉलोनियों में भी है। ऐसे इलाकों में एक तो निगरानी मुश्किल होती है और दूसरे शारीरिक दूरी का पालन भी कठिन होता है। कोविड-19 महामारी का एक सबक यह भी है कि महानगरों को बेतरतीब कॉलोनियों और झुग्गी बस्तियों से मुक्त करने की जरूरत है। ऐसे इलाके किसी भी संक्रामक बीमारी के समय बड़ा संकट खड़ा कर सकते हैं। कोरोना वायरस संक्रमण ने लोगों की सेहत के साथ-साथ उनकी रोजी-रोटी के लिए भी एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है-न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में।
अर्थव्यवस्था को दिया जोर का झटका 
कोरोना संक्रमण ने विश्व अर्थव्यवस्था को इतना तगड़ा झटका दिया है कि यह अनुमान लगाना भी कठिन है कि कितनी आर्थिक क्षति होने वाली है? भारत में भी इसका आकलन करना कठिन हो रहा है कि जीडीपी में कितनी गिरावट आएगी और उसके चलते कितनी नौकरियां खतरे में पड़ेंगी?
मजदूरों अपने गांव-घर लौट रहे हैं
अपने देश में चाहे शहरी इलाके हों या ग्रामीण, वहां आर्थिक गतिविधियां जिन मजदूरों और कामगारों के जरिये संचालित होती हैं वे अपने गांव-घर लौट रहे हैं। बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि के लाखों मजदूरों को ट्रेनों से उनके गांव-घर पहुंचाया जा रहा है। यह काम ऐसे समय हो रहा है जब लॉकडाउन में ढील देकर कारोबारी गतिविधियों को भी तेज करने की कवायद हो रही है।
जब मजदूर ही नहीं होंगे तो कारोबारी गतिविधियां आगे कैसे बढ़ेंगी
सवाल है कि जब मजदूर ही नहीं होंगे तो कारोबारी गतिविधियां आगे कैसे बढ़ेंगी? यह वह सवाल है जिस पर केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों को भी विचार करना चाहिए। उन्हेंं विचार इस पर भी करना होगा कि आखिर मजदूर घर क्यों लौटना चाह रहे? इसका कारण यही है कि सरकारों ने उनके रहने और खाने-पीने की व्यवस्था करने के जो तमाम दावे किए थे वे आधे-अधूरे साबित हुए। चूंकि मजदूरों को तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ा इसीलिए वे घर जाने को व्याकुल हुए और उनमें से तमाम दोबारा शहर न लौटने का मन बनाए हुए हैं। अगर वे वाकई फिर शहर नहीं लौटे तो एक नई मुसीबत खड़ी हो सकती है।
होटल, रेस्त्रां बंद रहने से फल-सब्जी आपूर्ति करने वाले किसान भी मुश्किल में हैं
केंद्र और राज्य सरकारें इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकतीं कि छोटे-बड़े कारखानों और कंस्ट्रक्शन के कामों के अलावा होटल, रेस्त्रां, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर, जिम आदि न केवल रोजगार मुहैया कराते हैं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को बल भी प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त होटल, रेस्त्रां आदि में फल और सब्जी की खपत किसानों के लिए मददगार साबित होती है। स्पष्ट है कि होटल, रेस्त्रां और खाने-पीने के अन्य ठिकाने जितने दिन बंद रहेंगे उतने दिन वहां काम करने वालों के साथ-साथ फल-सब्जी आपूर्ति करने वाले किसान भी मुश्किल में रहेंगे।
फल-सब्जियों को खराब होने से बचाने के आवश्यक उपाय अवश्य किए जाने चाहिए
फल-सब्जी किसानों की मुश्किलें कम हो सकती थीं, यदि देश के सभी हिस्सों में पर्याप्त संख्या में कोल्ड स्टोरेज होते। कम से कम कोरोना संकट से उबरने के बाद तो फल-सब्जियों को खराब होने से बचाने के आवश्यक उपाय अवश्य किए जाने चाहिए।
केंद्र सरकार कारोबार जगत को राहत पैकेज देने घोषणा जल्द से जल्द करे
हालांकि केंद्र सरकार कारोबार जगत को राहत पैकेज देने की तैयारी कर रही है, लेकिन उसे इसका आभास होना चाहिए कि इसमें देर हो रही है। यह देरी छोटे और मझोले कारोबारियों को भारी पड़ रही है। यह सही है कि भारत अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों की तरह अपने उद्योग जगत को भारी-भरकम पैकेज नहीं दे सकता, लेकिन अच्छा यह होगा कि प्रतीक्षित पैकेज की घोषणा जल्द से जल्द हो। इसलिए और भी, क्योंकि सरकार कारोबारी गतिविधियों को जल्द शुरू करना चाह रही है। अर्थव्यवस्था का थमा पहिया फिर से घूमे, इसके लिए रेड और ऑरेंज जोन में दी गईं रियायतों के असर की नियमित समीक्षा करने के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि इन जोन में आर्थिक गतिविधियां अपेक्षा के अनुरूप आगे बढ़ भी रही हैं या नहीं?
ग्रीन जोन में तीन सौ से अधिक जिलों में कोई बड़े कारोबार नहीं हैं
भले ही ग्रीन जोन में तीन सौ से अधिक जिले हों, लेकिन आमतौर पर वहां कोई बड़े कारोबार नहीं हैं। बेहतर होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें रेड जोन वाले जिलों में भी कोरोना संक्रमण वाले इलाकों यानी हॉट-स्पॉट को छोडकऱ अन्यत्र हर तरह की कारोबारी गतिविधियां शुरू करने की तैयारी करें, क्योंकि इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पूरी दिल्ली रेड जोन में है और कुछ ऐसी ही स्थिति मुंबई, अहमदाबाद आदि शहरों की भी है।
अगर संक्रमण फैला तो कारोबारी गतिविधियों पर नए सिरे से विराम लगेगा 
नि:संदेह कोरोना का खतरा टला नहीं है, लेकिन यह समय उससे डरकर बैठने का नहीं, बल्कि उसके साये में सावधानी के साथ जीने के नए तौर-तरीके विकसित करने का है। एक ओर सरकारों और उनकी एजेंसियों के साथ कारोबार जगत को यह देखना होगा कि आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियां तेजी से गति पकड़ें वहीं आम जनता को भी इसके प्रति सचेत रहना होगा कि कोरोना का संक्रमण नियंत्रण में बना रहे। अगर उसकी गलतियों या लापरवाही से संक्रमण फैलता है तो इससे सरकारों के साथ खुद जनता की समस्याएं भी बढ़ेंगी और इसका दुष्परिणाम यह होगा कि शुरू हो गईं कारोबारी गतिविधियों पर नए सिरे से विराम लगेगा।
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