चमत्का राजस्थान विशेष खबर-पत्रकार राजपुरोहित को हाईकोर्ट से राहत

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  • व्हाट्सएप्प पर मैसेज मिलने पर पुलिस निरीक्षक ने दर्ज करवाया था मुकदमा
  •  न्यायिक अभिरक्षा में श्रमिक नेता की संदिग्ध मौत की खबर से जुड़ा था मामला

चमत्का राजस्थान

जोधपुर/जयपुर। पाली में न्यायिक अभिरक्षा में श्रमिक नेता की संदिग्ध मौत से जुड़े मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली की आलोचना करने वाली खबर व्हाट्सएप्प पर प्रसारित करने के मामले में फंसे पत्रकार  को राहत देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने उनकी सीधी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है।
पाली में महाराजा श्रीउम्मेद मील में श्रमिकों और मील मालिक के विवाद में पुलिस से हुई झड़प के बाद पुलिस ने कई श्रमिकों और श्रमिक नेता रामनाथसिंह को गिरफ्तार किया था। पुलिस अभिरक्षा में उनके साथ मारपीट की तस्वीरें मीडिया में वायरल हुई। इसके बाद रामनाथ सिंह को न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया, जहां पर संदिग्ध अवस्था में उनकी मौत हो गई। पत्रकार  वीरेन्द्रसिंह राजपुरोहित ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। साथ ही व्टाहट्सएप्प पर सिटी कोतवाली एसएचओ गौतम जैन को सम्बन्धित न्यूज संदेश भेज दिया। गौतम जैन ने वीरेन्द्रसिंह के खिलाफ सिटी कोतवाली पुलिस थाने में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 388, 116, 500, 501, 506 और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 की धारा 67 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज करवा दिया।

पेशेवर उत्तरदायित्व के तहत उठाए थे सवाल

वीरेन्द्र सिंह की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट के एडवोकेट गोवर्धन सिंह और रजाक के. हैदर ने आपराधिक विविध याचिका दायर कर इस एफआईआर को चुनौती दी। जिस पर शुक्रवार को जित्शी एप्प से बहस करते हुए वकील रजाक के. हैदर ने कहा कि, याचिकाकर्ता पत्रकार ने न्यायिक अभिरक्षा में संदिग्ध मौत की एक गंभीर घटना पर अपने पेशेवर उत्तरदायित्व के तहत पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, जो कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार की श्रेणी में आता है। व्टाट्सएप्प पर न्यूज संदेश भेजने मात्र से पुलिस निरीक्षक गौतम जैन द्वारा अपने ही पुलिस थाने में आपराधिक मुकदमा दर्ज करवाना अपने पद एवं कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह मीडिया की स्वतंत्रता और स्वायत्ता को दबाने का भी प्रयास है।

सोशल मीडिया पर चलाया था अभियान

संवेदनशील पत्रकार के रूप में पहचाने जाने वाले पत्रकार वीरेन्द्रसिंह राजपुरोहित पर झूठा मुकदमा दर्ज करने के खिलाफ हजारों जागरूक लोगों ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाते हुए पुलिस की कार्यशैली की आलोचना की थी। इतना ही नहीं, कई लोगों ने पुलिस निरीक्षक गौतम जैन और पाली पुलिस अधीक्षक राहुल कोटोकी को वही व्हाट्सएप्प संदेश अपने नाम से भेजकर उनको चुनौती दी थी।

दस दिन में देना होगा प्रतिवेदन

सुनवाई के दौरान राजकीय अधिवक्ता ने पुलिस की ओर से प्रकरण की तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश की। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद जस्टिस पुष्पेन्द्रसिंह भाटी ने याचिकाकर्ता को दस दिन की अवधि में अनुसंधान अधिकारी को दस्तावेज सहित प्रतिवेदन प्रस्तुत करने और अनुसंधान अधिकारी को विधिक प्रक्रिया अपनाते हुए अनुसंधान के नतीजे तक पहुंचने से पहले उसे सख्ती से कंशीडर करने का आदेश पारित किया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की सीधी गिरफ्तारी पर भी रोक लगाने का आदेश दिया, ताकि याचिकाकर्ता बिना किसी भय के अपना पक्ष रख सके। हाईकोर्ट के आदेशानुसार अनुसंधान अधिकारी को गिरफ्तारी से पहले 15 दिवस का नोटिस देना अनिवार्य है। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रकरण के तथ्यों को देखते हुए न्याय हित में गिरफ्तारी को लेकर सीमित संरक्षण देना उचित है। याचिकाकर्ता को भी पुलिस अनुसंधान में सहयोग करने को कहा गया है। साथ ही अनुसंधान में किसी भी विधिक प्रक्रिया की पालना नहीं होने की स्थिति में फिर से न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की छूट दी गई है।

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर हमला

अगर इस मैसेज को भेजना पत्रकार स्वीकार कर भी ले तो भी कोई संघेय अपराध नही बनता जिससे एफआईआर दर्ज हो ये फिर पूरी तरह से फर्जी है इसका दुष्परिणाम दर्ज करवाने वाले पुलिस निरीक्षक को भुगतना पड़ सकता है ये सीधा सीधा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है