रानी जिंदा कौर

Maharani Jind Kaur(1817 - 1863), Maharaja Duleep Singh, wife of ...
रानी जिंदा कौ
  • ऐसी ममता की देवी, जिनसे अंग्रेज़ भी खाते थे खौफ!
  • एक ऐसी मां जिसे राज्य की रक्षा के लिए उसके मासूम बच्चे से दूर कर दिया गया. वो भी वो बच्चा जिसका उसकी प्यारी मां के अलावा इस दुनिया में कोई और सहारा भी न था. इसके बावजूद वो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्चा लेती रहीं.
  • ये दर्द सहने वाली कोई और नहीं बल्कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की छोटी पत्नी रानी जिंदा कौर थीं. इन्होंने पति की मृत्यु के बाद पंजाब का शासन ही नहीं संभाला, बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ कठोर नीतियां भी अपनाई.
  • इनकी इन्हीं रणनीतियों की वजह से अंग्रेज़ खौफ खाते थे. ऐसे में हमारे लिए पंजाब की वीरांगना रानी जिंदा कौर की जिंदगी से रूबरू होना दिलचस्प होगा.

तो आइये जानते हैं रानी जिंदा कौर से जुड़े कुछ रोचक बातों के बारे में...
पति की मौत के बाद संभाला पंजाब का शासन

रानी जिंदा कौर का जन्म 1817 में हुआ. इनके पिता सरदार मन्ना सिंह कुत्तों की रखवाली किया करते थे. उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह से अपनी बेटी को पत्नी के रूप में स्वीकार करने का अनुरोध किया था.
महाराजा रणजीत सिंह ने कई शादियां की थी, परन्तु इन्हें वारिस के रूप में सिर्फ पुत्र खडक़ सिंह की ही प्राप्ति हुई थी. उनकी भी तबियत लगातार खऱाब रहती थी. ऐसे में महाराजा रणजीत सिंह ने 1835 में जिंदा कौर को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया.
रानी जिंदा कौर महाराज की सभी पत्नियों में बेहद खूबसूरत थीं. शादी के बाद इन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया. जिनका नाम दिलीप सिंह रखा गया. महाराजा रणजीत सिंह उनमें अपना उत्तराधिकारी की झलक देखते थे.
आगे, 1839 में महाराजा रणजीत की मृत्यु हो गई. इसके बाद पंजाब राज्य में अराजकता का माहौल पैदा हो गया. शासन के लिए कई हत्याएं व साजिशें भी रची गईं. उस दौरान उनको महराजा रणजीत सिंह के भरोसेमंद लोगों से विश्वासघात भी मिला. कइयों ने अंदर ही अंदर अंग्रेजों से गुटबाजी कर रखी थी.
बहरहाल, रानी जि़न्दाकौर ने हार नहीं मानी. वो लाहौर दरबार के एक शक्तिशाली गुट को अपने पक्ष में करने में कामयाब रहीं. उनके समर्थन से उन्होंने 1843 में दिलीप सिंह को 5 वर्ष की आयु में ही पंजाब की गद्दी पर बैठा दिया. बेटे दिलीप सिंह के नाबालिग होने की वजह से वो खुद उनकी संरक्षिका बनी.
इसके बाद पंजाब राज्य में वो कुशल शासिका के रूप में उभर कर सामने आईं. जनता उनसे खुश थी. उन्होंने अपने शासनकाल में कई निर्णायक फैसले भी लिए थे.
रानी जि़न्दाकौर अपने वजीर राजा लाल सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने का बीड़ा उठाया. वो अंत में महराजा रणजीत सिंह की सेना को फिर से बल देने में कामयाब भी रहीं.
इसी दौरान इनके काम को देखते हुए पंजाब राज्य में इन्हें सिख समुदाय की ‘मां’ के ओहदे से भी नवाज़ा गया.

उनके बेटे को उनसे दूर लंदन भेज दिया

रानी जि़न्दा कौर को चुनार किले में नजऱबंद कर दिया गया था. इस दौरान उनकी पेंशन में भी अत्यधिक मात्रा में कटौती कर दी गई. ब्रिटिश सरकार के द्वारा उन्हें पंजाब मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए कठोर चेतावनी भी दी गई थी. गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने जोर देकर कहा वह राज्य के सभी सैनिकों के मुकाबले अधिक मूल्यवान हैं.
बहरहाल, 1949 में रानी जिंदा एक नौकरानी का भेष बदलकर चुनार किले भाग निकलने में कामयाब रहीं.  कई सौ मिल का सफऱ करने के बाद वो नेपाल पहुंची थीं. वहां काठमांडू में उन्होंने शरण लिया. इतिहासकारों की मानें तो 1857 की क्रांति में भी उन्होंने कश्मीर के महाराजा के साथ बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था.
इस दौरान उनके 9 वर्षीय पुत्र दिलीप सिंह को अंग्रेजों ने लंदन भेज दिया था. रानी को अपने बेटे से दूर होने पर गहरा दु:ख पहुंचा था. वो उससे मिलने के लिए तड़पती रहीं, मगर दुष्ट ब्रिटिश सरकार ने उन्हें उनसे दूर रखा. सरकार उस दौरान भी इन पर पैनी नजऱ बनाये हुए थे. खैर, बालक दिलीप सिंह वहां रानी विक्टोरिया के दरबार में अपने दोस्तों के संग पले बढ़े.

सालों नहीं हुई मां और बेटे की मुलाकात

दिलीप सिंह ने वहां पर ईसाई धर्म को अपना लिया था. उन्हें इंग्लैंड में ‘ब्लैक प्रिंस’ के नाम से बुलाया जाने लगा था.
सालों नहीं हुई मां और बेटे की मुलाकात

मां जिंदा और बेटे दिलीप ने एक दूसरे से मिलने के लिए कई प्रयास किए. वे असफल रहे. रानी ने कई ख़त भी अपने पुत्र के लिए लिखे, मगर उसे दिलीप सिंह तक नहीं पहुँचाया गया. उन दोनों के कई पत्र बाद में मिले भी थे. जिनको पढऩे के बाद एक दुखयारी मां की ममता व एक बेटे का मां से अद्भुत प्यार की झलकियां देखने को मिलती हैं. इन दोनों को इतना दूर रखने के पीछे भी एक वजह थी. ब्रिटिश सरकार को इस बात का डर था कि कहीं रानी व दिलीप सिंह के राजनीतिक सोच से नकारात्मक प्रभाव न पड़े. इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत कभी नहीं चाहती थी कि ये मां बेटे कभी मिलें. महारानी जिंदा अपने बेटे से दूर होने की वजह से कितना उदास थी वो अपने पत्रों में बयान करती हैं वो कहती हैं कि जिस बच्चे को उन्होंने 9 महीने अपनी कोख में पाला, उन्हें ब्रिटिश सरकार उनसे अलग कर दिया है.

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