ऑपरेशन जेरिको : जब, आसमान से नाजियों पर हुई ‘बमों’ की बरसात!

ऑपरेशन जेरिको: जब, आसमान से नाजियों ...
ऑपरेशन जेरिको
18 फरवरी 1944 की उस सुबह भारी बफऱ्बारी हो रही थी. जेल में तैनात नाज़ी सैनिकों को लगा कि आज के दिन तो कोई भी उनपर हमला करने की सोच भी नहीं सकता. 
उन्होंने इतना सोचा ही था कि तभी आसमान में कई प्लेन नजर आए और चंद सेकंड बाद उनसे गिरते हुए बम भी दिखने लगे. इसके बाद पूरी नाज़ी जेल में जगह-जगह धमाके हुए. पल भर में सब कुछ बदल गया...
ऊपर बताई गई बातें किसी फिल्म का सीन नहीं बल्कि दूसरे विश्व युद्ध में किया गया एक बहुत ही मुश्किल एयर मिशन था. ब्रिटिश वायुसेना द्वारा नाज़ी जेल में फंसे फ्रेंच कैदियों को बचाने के लिए इस ऑपरेशन जेरिको को अंजाम दिया गया था. 
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ऑपरेशन जेरिको
तो चलिए जानते हैं कि आखिर कैसे नाजी सैनिकों को ब्रिटिश वायुसेना द्वारा बमों की बारिश कर के हराया गया-
700 बेगुनाह फ्रेंच कैदियों की जान दांव पर थी!\ दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी सेना ने अपने पड़ोसी देशों पर बहुत जल्द ही कब्ज़ा कर लिया था. इनमें फ्रांस का भी नाम था. फ्रांस के एक काफी बड़े हिस्से पर नाज़ी सैनिकों का कब्ज़ा था. इतना ही नहीं वहां मौजूद एक बड़ी जेल पर भी उन्होंने अपना राज जमा लिया था.  उस जेल को नाज़ी सेना उन फ्रेंच विरोधियों को रखने के लिए इस्तेमाल करती थी, जो उनके खिलाफ आवाज़ उठाते थे. नाजियों का मकसद सिर्फ उन्हें जेल में रखना ही नहीं था बल्कि उन्हें ख़त्म करना भी था. 
इसलिए समय-समय पर, वो कई कैदियों को मार भी रहे थे. इसी बीच उन्होंने 19 फरवरी 1944 को करीब 100 और कैदियों को एक साथ मारने का प्लान बनाया था. हालांकि, ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को इस बात की खबर लग गई. 
उन्हें यह भी पता चला कि जेल में करीब 700 और कैदी मौजूद हैं, जिन्हें जल्द ही नाज़ी सेना ख़त्म कर देगी. कई लोगों की जान दांव पर लगी थी. ऐसे में ब्रिटिश सेना को ही कुछ करना था ताकि उन सब की जान बचाई जा सके. 
हालांकि, उस समय तक ब्रिटिश सेना को भी जंग के कारण काफी नुक्सान हो चुका था. इसके साथ ही जिस जगह पर वह जेल थी वहां पर जमीनी हमला नहीं किया जा सकता था. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे में नाज़ी सैनिक कैदियों को मार डालते. 
हर कोई परेशान था कि आखिर कैसे इस काम को अंजाम दिया जाए. प्लान बनाए जाने लगे और इसी बीच एक रास्ता भी निकलकर आया. रास्ता ये था कि जो काम जमीन से नहीं किया जा सकता उसे रॉयल एयरफोर्स आसमान से करें. 
ये काम बहुत मुश्किल था मगर रॉयल एयरफोर्स ने इससे करने का जिम्मा अपने कंधों पर ले लिया. इसके बाद शुरू हुई एक ऐसा अचूक प्लान बनाने की प्रक्रिया जिससे नाजियों की नाक के नीचे से सभी कैदियों को रिहा करवाया जा सके.

बम बरसाने के लिए तैयार किए गए प्लेन

यह तो तैय हो चुका था कि रॉयल एयरफोर्स के प्लेन इस काम को अंजाम देंगे मगर अभी इस मिशन के लिए एक अचूक प्लान बनाना बाकि था. 
ब्रिटिश एयरफोर्स के कई बड़े-बड़े पायलटों को मीटिंग के लिए बुलाया गया. कई घंटों तक चली मीटिंग के बाद आखिर में एक फाइनल प्लान बनकर सामने आया. 
प्लान के मुताबिक़ छोटे हमलावर प्लेन के द्वारा जेल पर हमला किया जाएगा. इस हमले में सिर्फ नाज़ी सैनिकों के अड्डों और जेल की दीवारों को ही नष्ट किया जाएगा. इस काम के लिए ख़ास ब्रिटिश 'मॉस्किटो' प्लेन का इस्तेमाल किया जाना था. 
ये प्लेन छोटे थे और बम बरसाने के काबिल भी. इन्हें आसानी से कम ऊंचाई तक लाया जा सकता था. ब्रिटेन के सबसे बेहतरीन पायलटों की टुकड़ी को इन प्लेनों को उड़ाने का काम सौंपा गया. 
सिर्फ इतना ही नहीं इस मिशन के लिए उनसे काफी कड़ी ट्रेनिंग भी करवाई गई. मिशन में एक छोटी सी गलती कई बेगुनाहों की जान ले सकती थी और कोई भी यह नहीं चाहता था. इसलिए सभी पायलटों ने जी-जान लगा के ट्रेंनिग की. 
कुछ दिन की ट्रेनिंग के बाद पायलटों को खुद पर इतना यकीन हो गया कि वह इस काम को अंजाम दे पाएंगे. पूरी ट्रेनिंग में से सिर्फ 18 पायलटों को ही चुना गया इस काम के लिए. उन 18 को ही नाज़ी सेना की एक बड़ी टुकड़ी का सामना करना था. 

खऱाब मौसम ने बढ़ाई मुश्किलें!

19 फरवरी आने वाली थी और अभी तक ब्रिटिश अपने मिशन को शुरू नहीं कर पाए थे. ऐसा नहीं था कि वह तैयार नहीं थे बल्कि उनकी असली परेशानी थी खराब मौसम. 
यूरोप में मौसम उम्मीद से कहीं ज्यादा खराब था और वहां लगातार बफऱ्बारी हो रही थी. ब्रिटिश अपने प्लेन भेज तो देते मगर उन्हें डर था कहीं बफऱ्बारी के कारण वह प्लेन क्रैश न हो जाए...
यहाँ मौसम ठीक नहीं हो रहा था और वहीं दूसरी ओर 19 तारीख नजदीक आ रही थी. हर कोई परेशान था और उम्मीद की कोई रोशनी नजर ही नहीं आ रही थी. 
दिन बीतते जा रहे थे और मौसम में कोई बदलाव नहीं आ रहा था. इंतज़ार करते-करते 17 फरवरी आ चुकी थी. इसके बाद तो ब्रिटिश वायुसेना ने सोच लिया कि अब तो जो भी हो 18 फरवरी की सुबह वो किसी भी हालत में मिशन के लिए निकलेंगे ही. 
सारे पायलट रात को ही मिशन के लिए तैयार हो गए और सुबह की पहली किरण के साथ वह इतिहास रचने निकल पड़े. 

..और जब नाजियों पर हुई बमों की बारिश

सुबह होते ही सभी पायलट अपने मॉस्किटो प्लेन लेकर निकल पड़े फ्रांस की जेल की ओर. उस दिन मौसम और भी ज्यादा खऱाब था. बफऱ्बारी काफी ज्यादा हो रही थी. माना जाता है कि रनवे पर कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था.
इसके कारण कुछ पायलट प्लेन को उड़ा ही नहीं पाए. वहीं कुछ ने प्लेन उड़ाया भी मगर खऱाब मौसम में वह अपनी राह से थोड़ा भटक गए. इसके कारण जिस टाइम पर उन्हें अटैक करना था, वह बढ़ गया. 
हालांकि, कुछ प्लेन जेल तक पहुँच चुके थे. सुबह-सुबह का वक्त था और नाज़ी सैनिकों को किसी हमले की आशंका भी नहीं थी. बफऱ्बारी देखकर उन्हें भी लगा कि वह हवाई हमलों से सुरक्षित हैं. 
ठीक सुबह के 8 बजे रॉयल एयरफोर्स के मॉस्किटो प्लेन जेल के ऊपर से गुजरे और उन्होंने बम दागने शुरू कर दिए. इससे पहले की नाज़ी सैनिक कुछ समझ पाते हमले बढ़ते गए.  कुछ हमलों में जेल की दीवारें तोड़ी गईं, तो वहीं दूसरी ओर कुछ हमलों में नाज़ी सैनिकों के बेस पर हमला किया गया. इन हमलों ने हडकंप मचा दिया. सभी कैदी भी समझ गए कि ये बमबारी उन्हें बचाने के लिए ही की गई है. 
इसके बाद उन्होंने भी जल्दी से जेल से भागना शुरू किया. भागने के दौरान नाज़ी सैनिकों ने उन्हें रोकने की खूब कोशिश की. इस दौरान उन्होंने गोलियां भी चलाई जिसमें कई कादियों की जान चली गई. हालांकि, अधिकाँश कैदी जेल से बाहर भागने में कामियाब रहे.  इसके बाद भी पायलटों ने बम बरसाने बंद नहीं किए. उन्होंने तब तक बम दागे जब तक नाज़ी सैनिक पूरी तरह से धराशायी नहीं हो गए.  सभी कैदियों को लाने के लिए पास में ही एक रेस्क्यू पॉइंट भी बनाया गया. जेल से बच के आए सभी कैदियों को प्लेन में बैठकर ब्रिटेन ले जाया गया.  इस मिशन को पूरा करके रॉयल एयरफोर्स ने अपना नाम इतिहास में दर्ज करवा लिया था. उन्होंने वो करके दिखा दिया था जिसे नामुमकिन माना जा रहा था. 

ब्रिटिश पायलटों के हाथों पर भी लगा खून!

18 फरवरी तक ब्रिटिश वायुसेना द्वारा किया गया मिशन एक सफल मिशन के तौर पर देखा जा रहा था. हालांकि, जब सच्चाई सामने आई, तो हर कोई हैरान होकर रह गया!  पायलटों ने कैदियों को रिहा तो करवा दिया था मगर उनकी भारी बमबारी के कारण कई कैदियों की जान भी चली गई थी. 
करीब 717 कैदी जेल में मौजूद थे, लेकिन उनमें से सिर्फ 258 ही सही-सलामत वापस लौट पाए. 74 कैदी, तो बम धमाकों में बुरी तरह से जख़़्मी हो गए थे. वहीं 102 कैदियों को अपनी जान गंवानी पड़ी. 
मरे हुए कैदियों में सारे ही ब्रिटिश पायलटों के द्वारा नहीं मारे गए थे. इनमें कुछ को नाज़ी सैनिकों ने भी मारा था. हाँ, मगर ब्रिटिश पायलटों की अधिक बमबारी के कारण भी कई कैदियों की जान गई.  माना जाता है कि खराब मौसम के कारण पायलटों को बम बरसाने में दिक्कतें आईं जिसके कारण ये बड़ा हादसा हुआ. इन सब के बावजूद ऑपरेशन जेरिको को एक सफल मिशन माना गया क्योंकि इसके कारण ही बाकी के कैदियों की जान बच पाई. 
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